Thursday, January 28, 2021

Mariana Trench: धरती का सबसे गहरा, अंधेरा कोना…जहां एलियन से कम नहीं जीवन के रहस्य

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शताक्षी अस्थाना
सूरज की रोशनी जहां कभी नहीं पहुंची। कहीं बर्फीला पानी तो कहीं उबाल देने वाले स्प्रिंग्स। प्रेशर इतना कि इंसान की हड्डियां पल में चकनाचूर हो जाएं। पानी की सतह से 11 हजार मीटर नीचे बसती है एक दुनिया जिसने समेट रखी हैं कई पहेलियां और होश उड़ा देने वाले नजारे। जिसकी तुलना चांद की सतह से की जाती है और जहां दूसरे ग्रहों की तरह वैज्ञानिक जीवन की खोज में जुटे रहे- ये है कहानी दुनिया के सबसे गहरे पॉइंट मारियाना ट्रेंच की।

धरती की सबसे खतरनाक जगहों में से एक

मारियाना ट्रेंच की गहराई इसे धरती की सबसे खतरनाक जगहों में से एक बनाती है। यहां सूरज की रोशनी पहुंचती नहीं और अंधेरे की चादर हमेशा कायम रहती है। उस पर से शून्य डिग्री सेल्सियस का जमा देने वाला तापमान। सबसे भयानक होता है पानी का दाब जो इंसानी हड्डियों को पल में चकनाचूर कर सकता है। यहां हर स्क्वेयर इंच पर 8 टन का दबाव होता है जो गहराई के साथ और भी ज्यादा बढ़ता जाता है। पानी का यह दबाव इंसानी शरीर पर इस तरह असर करता है कि ऐसा कोई भी हिस्सा जहां हवा भरी हो, वह बाकी नहीं रह जाता। धीरे-धीरे फेफड़े धंस जाते हैं और हड्डियां टूट जाती हैं।

मारियाना ट्रेंच धरती की सबसे बाहरी सतह, क्रस्ट की सबसे गहरी जगह है। यह कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट को ट्रेंच के सबसे गहरे पॉइंट पर रख दिया जाए तो भी उसकी चोटी समुद्र स्तर से 7 हजार फीट नीचे ही रह जाएगी। डॉ. राम करन ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को बातचीत में बताया कि ट्रेंच कैसे बनते हैं। उन्होंने बताया, ‘दो टेक्टॉनिक प्लेटों- पैसिफिक और मारियाना- की टक्कर से मारियाना ट्रेंच बना है। इसमें एक प्लेट दूसरी के नीचे दब गई जिसकी वजह से पुराना और घना क्रस्ट नीचे की सतह मैंटल में धंस गया।’

पाताल सी गहराई में जो दिखा उस पर किसी ने नहीं किया विश्वास

गहरे समंदर की इस अंजान दुनिया में पहली बार कदम रखा था ओशियनॉग्रफर जैक पीका और लेफ्टिनेंट डॉन वॉल्श ने। 23 जनवरी 1960 को Trieste नाम की सबमर्सिबल की खिड़की से बाहर झांकते हुए दोनों ऐसे नजारों के गवाह बने जो पहले किसी ने नहीं देखे थे। उनके अनुभव जानने के बेताब दुनिया के मन में सबसे बड़ा सवाल था कि क्या इतनी गहराई, ठंडे पानी और भयानक दबाव में जीवन की संभावना है? चार घंटे और 47 मिनट में सतह पर पहुंचने पर रेत में हुई हलचल की वजह से दोनों कोई तस्वीर नहीं ले सके लेकिन उनकी आंखों ने जो देखा उस पर लंबे वक्त तक बहस चलती रही।

जैक ने खिड़की को खिड़की से बाहर एक फ्लैटफिश नजर आई। उन्होंने फौरन वॉल्श को बताया। वॉल्श ने भी इस मछली को देखा और तभी नीचे से निकली रेत उनकी खिड़की के सामने आ गई। हालांकि, मरीन बायॉलजिस्ट्स ने दावा किया कि इतने दबाव में मछलियों का होना नामुमकिन है और पीका और जैक्स ने जो देखा वह कुछ और रहा होगा लेकिन अमेरिकी नौसेना के इन अनुभवी अफसरों ने साफ-साफ कहा कि जब तक वैज्ञानिक उन्हें गलत साबित नहीं कर देते वे यह मानते रहेंगे कि उन्होंने जो देखा वह मछली ही थी। इस मिशन के बाद भी यह सवाल बना रहा कि क्या मारियाना ट्रेंच में जीवन मुमकिन है।

…तो क्या यहां मुमकिन है जीवन?

डॉ. राम करन बताते हैं कि मारियाना ट्रेंच पर जीवन के बारे में अभी बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन जीवन जरूर फल-फूल रहा है। वह बताते हैं, ‘बिना रोशनी, एसिड, तापमान और दबाव जैसी स्थितियों में भी हैरान कर देने वाली संख्या में जीव यहां पाए जाते हैं। 200 से ज्यादा सूक्ष्मजीवियों से लेकर क्रस्टेशियन और ऐंफपॉड समेत सी क्युकूंबर, ऑक्टोपस और मछलियां यहां मौजूद हैं। साल 2014 में गुआम के पास सबसे गहराई में 8000 मीटर नीचे पाई जाने वाली स्नेलफिश की खोज की गई। जेम्स कैमरन ने जो तस्वीरें लीं उनमें एकदम गहराई में भी समुद्री जीवन देखा जा सका। इन पर वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं ताकि पता लगाया जा सके कि आखिर यहां जीवन कैसे मुमकिन है।

इन परिस्थितियों में भी कैसे पनप रहा है जीवन?

माना जाता रहा कि दबाव की वजह से कैल्शियम, जिससे हड्डियां बनती हैं, वह रह ही नहीं सकता है। बिना हड्डियों के मछलियों के जीवन पर भी सवाल बना रहा। हालांकि, डॉ. राम करन बताते हैं कि प्रकृति विज्ञान को हैरान करती रही है और मारियाना में स्नेलफिश का पाया जाना इसका सबूत है। उन्होंने बताया है, ‘सतह के पास रहने वाली मछलियों में तैरने के लिए ब्लैडर होता है जिसमें हवा भरी होती है। इसकी मदद से वे ऊपर-नीचे करती हैं लेकिन गहराई में रहने वाली मछलियों में ये एयर-बैग नहीं होते हैं। इसलिए दबाव का इन पर असर नहीं होता।’

यही नहीं, यहां पाए जाने वाले जीवों में हड्डियों के अलावा कार्टिलेज पर ज्यादा निर्भरता होती है। इनके खोपड़ों में भी जगह खाली रहती है ताकि टूटने का खतरा कम हो। सबसे बड़ा बदलाव जेनेटिक स्तर पर हुआ है। किसी भी प्रक्रिया के लिए उनके शरीर में मौजूद प्रोटीन अपनी संरचना स्थिरता के साथ बदल सकें, इसके लिए जरूरी TMAO (ट्राईमिथिलअमीन-ऑक्साइड) को बनाने वाले जीन की स्नेलफिश में ज्यादा कॉपी पाई गईं। बर्फीले पानी में रहने के लिए इन जीवों में ऐसे फैट होते हैं जो जमते नहीं हैं।

इसके अलावा अंधेरा होने के बावजूद के बाद कुछ जीव तेज नजर पर भरोसा करते हैं तो कुछ स्पर्श और वाइब्रेशन की मदद लेते हैं। कुछ खुद की रोशनी पैदा करते हैं जिससे शिकार को पकड़ा जाता है और खुद शिकार होने से बचा जाता है। सूरज की रोशनी के बिना होने वाली खाने की कमी ऊपर से आने वाले मृत जीवों के अवशेषों से लेकर लकड़ी के टुकड़ों तक पर निर्भर करते हैं।

यहां रिसर्च में क्यों जुटे हैं वैज्ञानिक?

डॉ. राम करन बताते हैं कि किसी भी ट्रेंच में छिपे रहस्यों को उजागर करने से दवाओं, खाद्य, ऊर्जा स्रोत जैसे उत्पाद तो मिल ही सकते हैं, भूकंप और सुनामी जैसी आपदाओं से बचने की तैयारी की जा सकती है। सबसे बड़े जिस सवाल का जवाब यहां छिपा हो सकता है वह है धरती के पर्यावरण में हो रहा बदलाव। इतने गहरे पानी, अंधेरे, दबाव और तापमान के हालात में रह रहे जीवों का विज्ञान हमें बता सकता है कि उनमें विकास (evolution) कैसे हुआ। रिसर्चर्स को गहरे समुद्र में रहने वाले ऐसे सूक्ष्मजीवी मिले हैं जो ऐंटीबायॉटिक और ऐंटी-कैंसर दवाओं के काम आ सकते हैं। ऐसे में यहां रिसर्च से डायबिटीज के इलाज से लेकर लॉन्ड्री डिटर्जेंट जैसी जरूरतों तक को पूरा किया जा सकेगा।

इंसानी करतूतों का अंजाम, गर्त तक में प्लास्टिक

नेचर इकॉलजी ऐंड एवलूशन में छपे रिसर्च पेपर के मुताबिक मारियाना ट्रेंच में प्रदूषण का स्तर पास के ऐसे क्षेत्रों से भी ज्यादा पाया गया जहां भारी औद्योगिकरण है। इससे संकेत मिलते हैं कि इंसानी गतिविधियों की वजह से होने वाला प्रदूषण गहराई में पहुंचने तक जमा होता रहता है (bioaccumulation) और अब दुनिया की सबसे गहरी जगह पर भी पाया जाने लगा है। इसका असर भी दिखने लगा है। मारियाना में प्लास्टिक के बर्तनों, डिब्बों, बैग जैसे कई सामान पाए जा चुके हैं। ब्रिटेन की द रॉयल सोसायटी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मारियाना ट्रेंच में ऐंफीपॉड जीवों में माइक्रोप्लास्टिक तक पाई गई है जो प्लास्टिक की बोतलों से लेकर हमारे कपड़ों तक में मौजूद होती है। आमतौर पर एशिया में चीन और जापान जैसे देशों के उद्योगों से ये माइक्रोप्लास्टिक पानी में पहुंचते हैं। इसके अलावा डॉ. राम करन बताते हैं कि समुद्र के तले में भूकंप आने से ऊपर पाए जाने वाले तत्व नीचे पहुंच सकते हैं। वह कहते हैं, ‘यहां इस स्तर पर प्रदूषक तत्वों का पाया जाना इंसानों के धरती पर हो रहे विनाशक असर का सच खोलता है।’

कितना बड़ा खतरा है मछलियों को मारने वाला ‘जहर’?

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि मरी हुई मछलियां ट्रेंच तक मरकरी यानी पारा लेकर जाती हैं। समुद्र में पारे का मिलना बेहद खतरनाक संकेत दिखाता है। ये एक न्यूरोटॉक्सिन होता है यानी दिमाग पर असर करता है। रिसर्च के मुताबिक कोयले पर निर्भर बिजली संयंत्र, सीमेंट फैक्टरी, इनसिनरेटर, खदानों और दूसरे ऐसे कल-कारखानों से ये जहर बारिश और धूल के जरिए नदियों के जरिए समंदर तक पहुंचता है। सूक्ष्मजीवी इसे और ज्यादा जहरीले मेथिलमरकरी (methylmercury) में तब्दील करते हैं। यह मछलियों और दूसरे सीफूड के जरिए इंसानों और वन्यजीवों के तंत्रिका तंत्र (nervous system), प्रतिरक्षा प्रणाली (immunity system) और पाचक तंत्र (digestive system) को भारी खतरा पहुंचा सकता है। डॉ. राम करन का कहना है कि भारत और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों को कोयले पर आधारित ऊर्जा संयंत्रों में पारे के उत्सर्जन को सीमित करना चाहिए।

इंसान कैसे पहुंचे हड्डियां तोड़ने वाली गहराई में?

साल 2012 में हॉलिवुड के मशहूर फिल्म डायरेक्टर जैम्स कैमरन ने एक सबमर्सिबल के अंदर 10,989 मीटर की गहराई छूने का अनोखा विश्व रेकॉर्ड बनाया था। साल 2020 में NASA की पूर्व ऐस्ट्रोनॉट कैथी सलिवन पहली महिला बनीं जब उन्होंने चैलेंजर डीप को छुआ था। कैथी स्पेस में चलने वाली पहली अमेरिकी महिला भी थीं। मारियाना ट्रेंच अब मारियानाज ट्रेंच मरीन नैशनल मॉन्युमेंट के तहत अमेरिका के प्रोटेक्टेड जोन में आता है। सिरेना डीप में रिसर्च की इजाजत अमेरिका का फिश ऐंड वाइल्डलाइफ सर्विस और चैलेंजर डीप में रिसर्च की इजाजत फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया से ली जाती है। निजी तौर पर किसी के लिए 100 फीट नीचे जाना भी मुश्किल होता है। वैज्ञानिक चैलेंजर डीप तक जाने के लिए Human Occupied Vehicles (HOV) का इस्तेमाल करते हैं।

मिलिए, पृथ्वी के सबसे गहरे पॉइंट को छूने वाली NASA की Astronaut Kathy Sullivan से

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