Sunday, June 13, 2021

अमेरिका तो चला, चीन को मिला सुनहरा मौका

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लेखकः रंजीत कुमार
यह विडंबना ही है कि अफगानिस्तान में आतंकवादी तत्वों को सबक सिखाने वाला अमेरिका 9/11 की 20वीं बरसी पर उन्हीं आतंकवादी गुटों के समक्ष आत्मसमर्पण करेगा, जिन्हें अमेरिकी हवाई हमलों के जरिए सत्ता से उखाड़ फेंका गया था। 11 सितंबर, 2001 को न्यू यॉर्क और वॉशिंगटन पर अलकायदा द्वारा यात्री विमानों से किए गए हमलों के बाद बौखलाए अमेरिका ने काबुल में अलकायदा और तालिबान के ठिकानों को लंबी दूरी की मिसाइलों से तहस-नहस कर दिया था। लेकिन आज अमेरिका 9/11 की उस दिल दहला देने वाली घटना को भूल जाना चाहता है। तब रूस और ईरान भी तालिबान के खिलाफ थे, लेकिन अमेरिका की अदूरदर्शी नीतियों की वजह से आज वह समीकरण पूरी तरह पलट चुका है। रूस और ईरान घोर अमेरिका विरोधी हो चुके हैं। अमेरिका को सबक सिखाने के लिए उन्होंने तालिबान के साथ रिश्ते बना लिए हैं।

काबुल के बाहरी हिस्से में अफगान सैनिकों का एक ऑपरेशन (फोटोः AP)

बाजी पलटने की उम्मीद
इस नए समीकरण से गत दो दशकों के दौरान तालिबान को संरक्षण और सैनिक मदद देने वाले पाकिस्तान को हारी हुई बाजी जीतने की उम्मीद दिखने लगी है। वह अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को गौण करते हुए अपनी अहमियत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दो दशक पहले अफगानिस्तान का तमाशा किनारे से देखने वाला चीन भी अब वहां केंद्रीय भूमिका में उभरने की कोशिश में जुट गया है। गत 10 मई को काबुल का दौरा कर अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी से मुलाकात करने वाले पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन वह अशरफ गनी की सरकार के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं। बाजवा द्वारा काबुल में जमीन तैयार करने के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग ई ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों से बात कर तालिबान और अफगान की जनतांत्रिक सरकार के बीच शांति वार्ता की मेजबानी करने की पेशकश की है। साफ है कि अमेरिका अफगानिस्तान में जो रिक्तता पैदा करेगा, उसे भरने का स्वर्णिम मौका चीन को मिला है और उसके लिए चीन ने राजनयिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

अमेरिका ने तालिबान से वादा किया है कि आगामी 11 सितंबर को अफगानिस्तान में बचे कुछ हजार सैनिक स्वदेश लौट जाएंगे। इसके पहले पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक मई से अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाने का वादा किया था, लेकिन नए राष्ट्रपति जो बाइडेन से यह उम्मीद की जा रही थी कि जनतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वह अफगानिस्तान को सैनिक और आर्थिक मदद न केवल जारी रखेंगे बल्कि रोजाना बीसियों हत्याएं करने वाले तालिबान को नेस्तनाबूद करने के लिए अफगानिस्तान से अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेंगे। वैसे तो अमेरिका का इरादा अफगानिस्तान को एक जनतांत्रिक व्यवस्था मुहैया कराकर उसे सुरक्षा प्रदान करने का था। इस मकसद पर वह न केवल एक हजार अरब डॉलर से अधिक खर्च कर चुका है बल्कि अपने ढाई हजार सैनिकों की कुर्बानी भी दे चुका है। उसकी अल्पदृष्टि वाली नीतियों की वजह से इस सब पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

सवाल है कि अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद मौजूदा अशरफ गनी सरकार को तालिबान के खूनी पंजे से कौन बचाएगा। कहने को वहां साढ़े तीन लाख सैनिकों वाली अफगान नैशनल आर्मी खड़ी की जा चुकी है, लेकिन क्या इसका मनोबल इतना पक्का बना रहेगा कि सिर से अमेरिकी फौज का हाथ हट जाने के बाद भी वह तालिबान के खिलाफ मुस्तैदी से खड़ी रहेगी? चीन यदि मौजूदा जनतांत्रिक सरकार के पक्ष में खड़े रहना चाहता है तो क्या पाकिस्तान भी ऐसा करेगा? चीन ने कहा है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अफगान सरकार के साथ सहयोग जारी रखेगा। लेकिन क्या जिस तालिबान को पाकिस्तान ने खड़ा किया है उसकी आतंकवादी हरकतों के खिलाफ वह अपनी ताकत झोंकेगा? पाकिस्तान और चीन के सामने बड़ी दुविधा यह है कि वे तालिबान का साथ कैसे छोड़ें। हालांकि दोनों देशों के अपने डर भी हैं। यदि जेहादी गुट फिर से काबुल की सत्ता पर हावी हो जाएगा तो उससे चीन में अलगाववादी उइगुर ताकतों को भी बढ़ावा मिलेगा। उधर पाकिस्तान को चिंता है कि तालिबान के काबुल में सत्तारूढ़ होने से तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी गुटों की ताकत बढ़ेगी। ये संगठन अपनी बढ़ी हुई ताकत से पाकिस्तान की सैन्य संरक्षण वाली नागरिक सरकार के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

सवाल यह भी है कि यदि काबुल में तालिबान की अगुआई में इस्लामी अमीरात का रास्ता साफ होता है तो काबुल की मौजूदा जनतांत्रिक सरकार में शामिल नेताओं और महिलाओं का क्या होगा। अभी यह भी तय होना बाकी है कि तालिबान के किस शूरा के हाथ में काबुल की सत्ता जाएगी। पाकिस्तान में तालिबान के तीन शूरा सक्रिय हैं- क्वेटा शूरा, पेशावर शूरा, मिरानशाह शूरा। इसके अलावा अफगानिस्तान में भी तालिबान के कई क्षेत्रीय युद्ध-सरदार हैं, जो सत्ता में अपनी भागीदारी चाहेंगे। सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए क्या इनके बीच ही आपस में मारकाट नहीं होगी?

भारत की चिंता
इन सवालों के बीच अमेरिका के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद चीन विभिन्न जेहादी गुटों और अफगानिस्तान सरकार के बीच बिचौलिये की भूमिका में अपने को पेश कर भविष्य के शासकों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है ताकि चीन के उइगुर अलगाववादियों को अफगानिस्तान की धरती से किसी तरह की मदद नहीं मिल सके। स्वाभाविक है कि चीन की मेजबानी में जो शांति वार्ता पेइचिंग में होने की संभावना बन रही है, उसमें भारत की कोई भूमिका नहीं होगी। अफगानिस्तान का अनिश्चय से भरा भविष्य भारत के लिए चिंता पैदा करने वाला है क्योंकि भारत को न केवल वहां विकास पर किए गए तीन अरब डॉलर के निवेश से हाथ धोना पड़ सकता है बल्कि अफगान के रास्ते मध्य एशिया से रिश्ते मजबूत करने के जो ठोस कदम उठाए गए थे, उन पर भी आंच आ सकती है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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