Tuesday, November 24, 2020

इस्लाम और पश्चिम की समस्या एक है

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लेखकः भरत झुनझुनवाला
इस्लाम और पश्चिमी देशों के भौतिकवाद, दोनों विचारधाराओं में एक बड़ी समानता यह है कि दोनों में बराबरी के भाव को काफी अहमियत दी जाती है। छठी शताब्दी में अरब देशों में भयंकर असमानता थी। दास प्रथा थी। उस परिस्थति में पैगंबर मोहम्मद साहब ने क्रांतिकारी पैगाम दिया था कि हर मनुष्य अल्लाह की नजर में बराबर है। इसी प्रकार फ्रांस में 1789 में क्रांति हुई, जिसका मुख्य मुद्दा था ‘स्वतंत्रता, समानता, बिरादरी।’ वहां भी हर मनुष्य को बराबर माना गया। लेकिन समय क्रम में दोनों विचारधाराओं ने अलग अलग प्रकार से बराबरी के मंत्र को नकार दिया है। मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम की व्याख्या करने का कार्य परंपरा या ‘सुन्नाह’ ने अपने ऊपर ले लिया। इसी से ‘सुन्नी’ शब्द बनता है।

समानता का आग्रह छूटा
‘आफ्टर द प्रॉफेट’ पुस्तक की लेखिका लेसली हेजिल्टन के अनुसार मोहम्मद साहब के बाद पहले दो खलीफा अबू बक्र और उमर के समय तक सादगी और समानता का माहौल बना रहा लेकिन तीसरे खलीफा उस्मान के समय परिस्थति ने पलटा खाया। उन्होंने मदीना में एक विशाल राजमहल बनवाया जिसमें संगमरमर के खंभे लगाए गए। उस महल में विदेशों से लाया गया भोजन परोसा जाता था। खलीफा उस्मान ने विशाल भूमि के क्षेत्र, हजारों घोड़े और दास अपने नजदीकी लोगों को दान में दिए। सऊदी अरब जैसे देशों में आज यह असमानता चरम रूप में देखी जा सकती है। यह असमानता मोहम्मद साहब के विचारों के विपरीत दिखती है। लेकिन इस सामाजिक व्यवस्था के पवित्र कुरान के अनुरूप होने या न होने की व्याख्या सुन्नाह द्वारा की जाती है। इसलिए आज यह असमानता इस्लामिक देशों में इस्लाम के अनुरूप मानी जाती है।

इस असमानता पर सवाल उठाने का किसी को हक नहीं है। इस्लाम की इस असमानातावादी वर्तमान व्याख्या में परिवर्तन नहीं हो पा रहा है। इस विषय पर मुझे कुरान और सुन्नाह में अंतर दिखाई देता है। कुरान की आयत 2.256 में स्पष्ट कहा गया है कि ‘धर्म में कोई जोर जबरदस्ती नहीं है।’ लेकिन मोहम्मद साहब के कहे हुए वाक्यों में बुखारी की हदीस 9.59 में कहा गया कि जो ‘इस्लाम धर्म को बदल दे उसे मार दो।’ इस प्रकार कुरान से समानतावादी और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल संदेश को सुन्नाह ने असमनातावाद और कट्टरवाद में परिवर्तित कर दिया है। इस परिवर्तन को अब पुनः रास्ते पर लाना कठिन हो गया है क्योंकि कुरान की आयत 3.92 में कहा गया कि मोहम्मद साहब आखिरी पैगंबर हैं। हालांकि इस आयत को दो तरह से समझा जा सकता है।

लाहौर में बुधवार को निकले एक फ्रांस विरोध प्रदर्शन का सीन

पहला कि उस समय तक जितने पैगंबर थे उनमें मोहम्मद साहब आखिरी थे। दूसरा कि भविष्य में होने वाले पैगंबरों में भी वे आखिरी थे। सुन्नाह के अनुसार मोहम्मद साहब आने वाले संपूर्ण भविष्य के आखिरी पैगंबर थे इसलिए मोहम्मद साहब ने जो संदेश दिया और जिसकी सुन्नाह ने असमानतावादी व्याख्या की, उसमें अब कोई परिवर्तन करने की संभावना नहीं रह जाती है। यही कारण है कि आज इस्लाम धर्म ने एक निश्चित रूप धारण कर लिया है जिसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है और इस्लामी सभ्यता रुक सी गई है।

दूसरी ओर लगभग ऐसी ही परिस्थिति पश्चिमी संकृति की भी है। यूरोप में पहली सहस्त्राब्दी में ईसाई लोगों ने आपस में भारी मारकाट की जिसे इनक्वीजिशन नाम से जाना जाता है। इसके बाद 1789 में फ्रांस में क्रांति हुई और बराबरी की विचारधारा का प्रचलन हुआ। लेकिन इस बराबरी की विचारधारा के विपरीत क्रांतिकारी फ्रांस ने ही उत्तरी अफ्रीका के विशाल क्षेत्र को अपना उपनिवेश बनाया और उसमें तमाम लोगों पर अत्याचार किए। पिछली सदी में उपनिवेशवाद के समाप्त होने के बाद फ्रांस समेत पश्चिमी सभ्यता की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने क्रूर भौतिकवाद को पोषित करने के लिए व्यापार के माध्यम से गरीब देशों का शोषण किया।

बराबरी की जो व्याख्या फ्रांस की क्रांति में की गई थी, उसे इन्होंने अपने देश की सीमा के अंदर तक सीमित कर दिया। सीमा के बाहर दूसरे देशों के लोगों के साथ बर्बरता आज भी मान्य है। फिर भी कहना पड़ेगा कि पश्चिमी सभ्यता में परिवर्तन होता रहा है। किसी समय उपनिवेशवाद को मान्यता थी लेकिन आज उसकी मान्यता नहीं है। इसकी तुलना में इस्लाम धर्म में परिवर्तन रुक गया है क्योंकि कुरान की 3.92 आयत के अनुसार मोहम्मद साहब आखिरी पैगंबर थे और उनका दिया गया आदेश आखिरी आदेश था जो चिरकाल तक चलता रहेगा।

दोनों सभ्यताओं में दूसरा अंतर सर्व-व्यापकता का है। इस्लाम में अल्लाह को सर्वव्यापी माना गया। फ्रांस की क्रांति में भी सभी को स्वतंत्रता, समानता और बिरादरी के दायरे में लाया गया। लेकिन अंतर यह है कि इस्लाम की सर्व-व्यापकता मनुष्य के विचार के बाहर है। अल्लाह समाज के अतिरिक्त है। अल्लाह के कहे की व्याख्या सुन्नाह द्वारा निर्धारित हो जाती है और इसके ऊपर कोई चर्चा नहीं हो सकती है। जनता के प्रति इस्लाम की कोई जवाबदेही नहीं है। इसकी तुलना में फ्रांस की विचारधारा की सर्व-व्यापकता मनुष्यों में ही है और वह संपूर्ण मानवता के प्रति जवाबदेह है। इस विचारधारा पर कोई भी मनुष्य प्रश्न उठा सकता है। इसलिए पश्चिमी सभ्यता में परिवर्तन देखा जा सकता है जो कि इस्लाम में नहीं देखा जाता है।

जवाबदेही का सवाल
सारांश यह है कि इस्लाम और पश्चिमी सभ्यता, दोनों में समानता की विचारधारा गहरी है लेकिन इस्लाम में समानता के इस मंत्र को सुन्नाह ने खारिज कर दिया जबकि पश्चिमी सभ्यता ने इसे अपने देश तक सीमित करके खारिज किया। अतः सुधार की जरूरत दोनों में है। इस्लाम को मानवता के प्रति जवाबदेही स्वीकार करनी होगी और पश्चिमी सभ्यता को संपूर्ण मानवता के प्रति जवाबदेही स्वीकार करनी होगी। दूसरा सवाल दोनों विचारधाराओं में सर्व-व्यापकता का है। इस्लाम की सर्वव्यापी अल्लाह के प्रति जवाबदेही और फ्रांस की सर्वव्यापी मानवता के प्रति जवाबदेही में कोई मौलिक अंतर नहीं है लेकिन इनमें समन्वय करने की जरूरत है। जब तक इस्लाम और पश्चिमी संस्कृति. दोनों अपनी इन खामियों को दूर नहीं करेंगे तब तक विश्व में शांति बहाल होना कठिन दिखता है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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