Friday, May 14, 2021

कोरोना के बढ़ते मामलों पर राज्य भी गलत हैं, उनसे क्यों नहीं पूछते सवाल

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लेखकः उमेश चतुर्वेदी
मौत चाहे अकेली हो या हजार, उसके आंकड़े प्रशासनिक नाकामी और कामयाबी की कहानियों को समझाने का जरिया बन जाते हैं। और कोरोना के चलते मौत के जो आंकड़े इन दिनों आ रहे हैं, वे हर लिहाज से दारुण हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर चूक कहां हुई। भारतीय संविधान के मुताबिक, स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। फिर भी, कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर चौतरफा सवालों के घेरे में केंद्र की मोदी सरकार है। पूछा जा रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर के लिए केंद्रीय स्तर पर तैयारी क्यों नहीं की गई। राज्यों से भी सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन ऐसा कम ही नजर आ रहा है।

कोरोना से लड़ाई में भारत की ओर से हुई चूक पर मशहूर अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘नेचर’ के ताजा अंक में महामारी विशेषज्ञों के हवाले से गंभीर चर्चा है। पत्रिका के मुताबिक, सितंबर 2020 में कोरोना की पहली लहर का पीक जब गुजर गया तो भारत में मान लिया गया कि देश ने कोरोना के खिलाफ जंग जीत ली है। नतीजतन, राज्यों ने ढिलाई देनी शुरू कर दी। माना गया कि इससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।

वैक्सीन से उपजी लापरवाही
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में मामले तेजी से बढ़े। ऐसे में तभी से एहतियात बढ़ाया जाना चाहिए था। अफसोस, ऐसा नहीं हो पाया। नतीजा यह कि दूसरी लहर के दौरान रोजाना तीन लाख से ज्यादा संक्रमण के मामले आ रहे हैं। उनमें 76 प्रतिशत सिर्फ दस राज्यों के हैं, जिनमें महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शामिल हैं। महामारी की गंभीरता का अंदाजा लगाने में चूक का ही नतीजा है कि ऐन मौके पर ऑक्सिजन की कमी महसूस होने लगी।

दिल्ली में ऑक्सिजन शॉप पर रीफिल कराने वालों की लंबी कतार (फोटोः PTI)

आम लोगों में कोरोना को लेकर लापरवाही बढ़ने की वजह देश में विकसित दो वैक्सीनों – कोविशील्ड और कोवैक्सीन- की खबरें भी रहीं। हालांकि ‘नेचर’ की रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं है। लेकिन जो सार्वजनिक परिवहन के आदी हैं, जिन्हें चौक-चौराहों पर चाय पीने-पिलाने की आदत है, वे जानते हैं कि वैक्सीन तैयार होने की खबरें आने के बाद आम मानस बेफिक्र होने लगा। माना जाने लगा कि अब क्या डर है? दुखद यह है कि कोरोना की बढ़ती लहर के बावजूद इस सोच में बदलाव नहीं आया है। दिल्ली और महाराष्ट्र में लॉकडाउन के बावजूद पार्कों में बिना मास्क के घूमती-खेलती भीड़ की तस्वीरें अखबारों में दिखती रही हैं। सरकारी तंत्र कोरोना प्रोटोकॉल का पालन सिर्फ मुख्य सड़कों तक ही करा पा रहा है। कई जगह लॉकडाउन के बावजूद घनी बस्तियों में दुकानें तक खोली जा रही हैं। लोग चाय, पान-मसाला, गुटका आदि पहले की ही तरह झुंड बनाकर खा रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक पहली लहर खत्म होने के बाद भीड़ वाले आयोजनों की संख्या में बढ़ोतरी भी कोरोना के बढ़ते मामलों की वजह है। उससे पहले शादी-ब्याह, मुंडन-जनेऊ के लिए होने वाले आयोजनों में शामिल होने वाले लोगों की संख्या राज्य सरकारें निर्धारित करती थीं। उल्लंघन पर आर्थिक दंड की व्यवस्था थी। लेकिन उत्सवधर्मी भारतीय समाज इस मर्यादा को भी मानने में हेठी महसूस करता रहा। पुलिस या नगर निगम तंत्र उन पर दंड तो लगाता था, साथ में संबंधित ऑफिसर खुद ही यह सुझाव भी दे देते थे कि छोटे-छोटे गुटों में लोगों को बुलाकर, खिला-पिलाकर रुखसत करते रहो।

दरअसल, भारत में सामाजिक सोच की बजाय अब निजी सोच बढ़ गई है। जिस तरह की भारतीय सोच इन दिनों है, उसमें किसी भी कार्यक्रम के ईमानदार क्रियान्वयन की उम्मीद ही बेमानी है। यहीं पर सरकारी चाबुक की जरूरत होती है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह चाबुक भी गायब रहा। वैसे नागरिकबोध जगाने के लिए चाबुक की जरूरत पड़ना भी लोकतंत्र की कमजोरी ही है। अठारहवीं सदी तक भारत का सामाजिक ढांचा खासा मजबूत था। इस वजह से उसे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए राजसत्ता का मुंह नहीं देखना पड़ता था। अंग्रेजों ने अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए इस ढांचे को तोड़ डाला। कोरोना के दौरान यह भी दिखा कि भारत की सामाजिक सत्ता खत्म हो चुकी है। हर बात के लिए राज्य की ओर टकटकी लगाए देखना समाज की मजबूरी हो गई है। चाहे सरकार कोई भी हो, उसके लिए भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में हर नागरिक को अस्पताल जैसी सहूलियत दे पाना संभव नहीं।

कोरोना कोई सामान्य बीमारी नहीं। वह संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित करती है। निजी स्वच्छता और व्यक्तिगत अनुशासन से ही इससे बचा जा सकता है। इन्हें भी लागू कराने के लिए सरकारों को जिम्मेदार ठहराना बेमानी है। कहा जा रहा है कि देश का स्वास्थ्य ढांचा चरमरा चुका है। करीब छह दशक पहले ‘तरुणों से’ शीर्षक निबंध में आचार्य विनोबा भावे ने लिखा था, राष्ट्ररूपी घड़े में सुराख ही सुराख है। दुर्भाग्यवश भारत में कभी-भी इन सुराखों को भरने की ईमानदार कोशिश नहीं हुई। अंग्रेजों द्वारा विकसित भारतीय प्रशासनिक ढांचा जैसा है, उसमें रातोंरात चमत्कारिक बदलाव लाना आसान नहीं। यह तथ्य हर नागरिक और हर दल जानता है। चाहे नागरिक हों या दल, उन्हें अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने में ही अपनी भलाई दिखती है।

राष्ट्रीय संकट की घड़ी
देश ने इसे राष्ट्रीय संकट की घड़ी मान लिया है। इसमें आलोचनाओं से ज्यादा जरूरत युद्ध स्तर पर राहत पहुंचाने की है। यह काम अकेले न तो केंद्र सरकार कर सकती है और ना ही कोई राज्य सरकार। दुर्भाग्यवश इस दौर में भी राजनीति हो रही है। यह दौर राजनीति से ज्यादा संयम का है। चाहे पक्ष हो या विपक्ष, आम हो या खास, अभी संकट मानवता पर है और इस संकट को टालने के लिए हर पक्ष को आगे आना होगा। भारतीय समाज को उसी तरह ताकतवर होना होगा, जैसा वह अंग्रेजों के आने से पहले तक था। ऐसा समाज जो सामाजिक जरूरतों के लिए राज्य पर कम, खुद पर ज्यादा भरोसा करता था।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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