Wednesday, June 16, 2021

क्या इस साल सबको टीका लग पाएगा?

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लेखकः नीरेंद्र नागर
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि दिसंबर 2021 तक 18 साल से ऊपर की सारी आबादी (करीब 104 करोड़) को दोनों टीके लग चुके होंगे और एक तरह से भारत कोरोना के भय से मुक्त हो चुका होगा। अधिकतर विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें कम-से-कम एक साल और अधिक-से-अधिक तीन साल का समय लग सकता है। आइए, समझते हैं कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। देश में कोविशील्ड और कोवैक्सीन नाम के दो टीके अभी लगाए जा रहे हैं, जिनका उत्पादन पिछले साल के अंत में शुरू हो गया था और इस साल जनवरी से उन्हें लगाए जाने का काम शुरू हुआ। इस साल 16 जनवरी से 31 मई के बीच के साढ़े चार महीनों में करीब 22 करोड़ टीके लग चुके हैं। मगर हम जानते हैं कि इन दोनों टीकों की दो खुराकें लगनी जरूरी हैं। उस हिसाब से केवल 4 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें दोनों टीके लगे हैं।

बेंगलुरू यूनिवर्सिटी में वैक्सीन के लिए कतार में खड़े स्टूडेंट (फोटोः सईद आसिफ)

मुश्किल है लक्ष्य
तो अगले सात महीनों में 100 करोड़ लोगों को दोनों टीके (यानी 200 करोड़ टीके) कैसे लग सकते हैं? इसके लिए हर महीने 28 करोड़ टीके लगने चाहिए, जबकि मई में करीब 6 करोड़ टीके ही लग पाए। 6 करोड़ प्रति महीने से 28 करोड़ प्रति महीने का आंकड़ा तभी छुआ जा सकता है जबकि ये कंपनियां उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ाएं। आइए देखते हैं कि सरकार को दिसंबर 21 तक कौन-सी वैक्सीन कितनी मात्रा में मिलने की उम्मीद है।

• कोविशील्ड : 75 करोड़
• कोवैक्सीन: 55 करोड़
• स्पूतनिक V: 15.6 करोड़
• कोवोवैक्स: 20 करोड़
• जाइकोव-डी: 5 करोड़
• नासिका वैक्सीन: 10 करोड़
• बायो-ई वैक्सीन: 30 करोड़
• जेनोवा mRNA: 6 करोड़

पहले कोविशील्ड पर आते हैं। अब तक का 90% टीकाकरण इसी से हुआ है। यानी 22 करोड़ में से 20 करोड़ टीके कोविशील्ड के ही लगे हैं। अगर इसमें वे 6 करोड़ टीके भी जोड़ दें जो निर्यात किए गए तो जिस कंपनी ने पिछले आठ महीने में 26 करोड़ टीके बनाए, वह क्या अगले सात महीने में उसका तीन गुना यानी 75 करोड़ टीके बना सकती है? कोविशील्ड बनाने वाली सीरम इंस्टिट्यूट (SII) के दावे पर विश्वास करें तो जवाब है – हां। अभी पिछले दिनों कंपनी ने भारत सरकार को चिट्ठी लिखी है कि वह इस महीने यानी जून में 10 करोड़ टीके सप्लाई करने की स्थिति में है। अगर वह वाकई ऐसा कर सकती है तो हमें भरोसा करना होगा कि वह बाकी के छह महीनों में अपना टार्गेट पूरा कर सकेगी।

लेकिन सीरम को कोवोवैक्स नामक एक और वैक्सीन बनानी है, जिसका उत्पादन सितंबर से शुरू होना है। नोवोवैक्स नामक एक अमेरिकी कंपनी से हुए करार के हिसाब से उसे इसकी कुल 100 करोड़ खुराकें बनानी हैं। इनमें से 20 करोड़ उसे भारत को देनी हैं, वह भी दिसंबर 21 तक। क्या वह ऐसा कर पाएगी? अगर हां तो क्या उससे कोविशील्ड का उत्पादन प्रभावित होगा? वैसे नोवोवैक्स का फेज 3 ट्रायल अभी चल रहा है।

अब बात कोवैक्सीन की, जिसका टीकाकरण में केवल 10% योगदान रहा है। अप्रैल में इसका उत्पादन 1 करोड़ वैक्सीन प्रति माह था। इसे बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक का लक्ष्य था कि मई-जून तक इसे दोगुना कर दिया जाए और सितंबर तक अपनी उत्पादन क्षमता 10 करोड़ प्रति माह तक ले जाए। ध्यान दीजिए, उसे साल के अंत तक 55 करोड़ वैक्सीन देनी हैं और उसके इस काम में चार और कंपनियां भी मदद कर रही हैं।

भारत बायोटेक नाक से दी जाने वाली एक वैक्सीन (BBV154) पर भी काम कर रही है, जिसके पहले फेज का ट्रायल हो चुका है। उसे 10 करोड़ वैक्सीन इस मद में भी देनी है। इसका काम कब शुरू होगा और कब ये वैक्सीन बाजार में आएगी, इसका कोई अंदाजा हम नहीं लगा सकते। कारण यह कि वैक्सीनों के उत्पादन और वितरण के बीच काफी लंबा गैप होता है – कभी-कभी तीन-चार महीनों तक का। इसलिए कोविशील्ड और कोवैक्सीन की उपलब्धता के बारे में हम जितने निश्चिंत हो सकते हैं, उतने उन वैक्सीनों के बारे में नहीं, जिनका अभी ट्रायल चल रहा है। सरकार जिन आठ टीकों पर भरोसा कर रही है, उनमें से चार टीके ऐसे हैं, जो अभी ट्रायल के दौर में हैं।

वैक्सीन को लेकर झिझक
अगर हम मान लें कि सरकार देश में दिसंबर 21 तक 200 करोड़ टीके उपलब्ध कराने में सफल हो जाती है, तब भी क्या 18 साल से ऊपर की सारी आबादी को टीका लग पाएगा? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि शुरुआती महीनों में केंद्र ने राज्यों के माध्यम से टीके मुफ्त में या 250 रुपये में उपलब्ध करवाए। अब केंद्र सबकुछ राज्य सरकारों पर छोड़ रहा है। राज्यों और निजी अस्पतालों को बाजार भाव पर टीका खरीदना होगा। जैसा कि हम जानते हैं, कुछ निजी अस्पतालों में टीकों की कीमत 1 हजार से भी ज्यादा ली जा रही है। ऐसे में देश की बड़ी आबादी मुफ्त टीकों पर ही निर्भर करेगी। लेकिन क्या सभी राज्य सरकारें मुफ्त में टीके लगाएंगी? कुछ सरकारों ने चुनाव से पहले मुफ्त टीकाकरण का वादा किया था, लेकिन तब अंदाजा था कि ये टीके केंद्र से मुफ्त में या 150 रुपये की दर पर मिलेंगे। अब जब उन्हें बाजार दर पर टीके खरीदने हैं तो वे अपने वादे पर अमल करते हुए महंगे टीके खरीदेंगी या हर्ड इम्यूनिटी आने और कोरोना संक्रमण के खत्म होने की प्रतीक्षा करेंगी (ताकि टीके लगाने की जरूरत ही न रहे), कहा नहीं जा सकता।

दिसंबर 21 तक 18 साल से ऊपर सभी भारतीयों को टीका लगने में एक बाधा खुद जनता से आ सकती है। हम देख रहे हैं कि अमेरिका और चीन तक में कई लोग टीका लगवाने से बच रहे हैं। भारत में भी यह झिझक दिखी है। अब अगर दूसरी लहर खत्म होती है और तीसरी लहर जल्द नहीं आती तो टीके से बचा एक बड़ा हिस्सा शायद टीके के प्रति रुचि न दिखाए, ख़ासकर तब जब उसे निजी अस्पतालों में जाकर दो-ढाई हजार रुपये खर्च कर टीका लगवाना पड़े। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार की इस वैक्सीन नीति और टीकों की दोहरी कीमत पर सवाल उठाया है। उम्मीद है, इससे टीकाकरण अभियान में आई अनिश्चितता समाप्त होगी।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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