Saturday, April 17, 2021

जब दो परिवारों वाले बूथ पर हुई री-पोलिंग

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कोई भी चुनाव हो और उसमें शेषन याद न किए जाएं, यह मुमकिन ही नहीं। सच पूछा जाए तो उन्होंने ही चुनाव आयोग को उसकी असली ताकत का अहसास कराया। बतौर चुनाव आयु्क्त उन्होंने अपने फैसलों की कोई सीमा तय नहीं की। एक बार लिए अपने फैसले को पलटना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था। उनके साथ काम कर चुके अधिकारियों के पास उनसे जुड़ी ऐसी तमाम यादें हैं जो उन्हें कई मौकों पर हंसने का कारण भी दे देती हैं। शेषन के ही कार्यकाल का यह फैसला था कि अधिकतम वोटिंग होनी चाहिए और इसके लिए राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पहल करनी होगी। उस वक्त के एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी को याद है नॉर्थ ईस्ट की वह घटना। एक बहुत दुर्गम स्थल था, वहां सिर्फ दो ही परिवार रहते थे और वहां से मतदान केंद्र बहुत दूर था। वहां के अफसर को लगा कि अतिरिक्त प्रयास के जरिए अगर इन दोनों परिवारों के वोट डलवा दिए जाएं तो ‘बॉस’ को खुश किया जा सकता है। गाड़ी से लेकर हेलिकॉप्टर तक के जतन किए गए और उन दोनों परिवारों के वोट पड़ गए। अगले दिन हर एक गांव की वोटिंग परसेंटेज की रिपोर्ट बनती है, पता चला कि इस गांव के लिए ‘री-पोलिंग’ का आदेश हो गया। जानते हैं क्यों? शेषन ने एक जनरल आदेश कर दिया था कि जिन-जिन गांवों में 100 % वोटिंग हुई है, वहां री-पोलिंग कराई जाए ताकि जबरन वोट डालवाने की जितनी भी शिकायतें आई हैं, उनका निराकरण हो सके। चूंकि उस गांव में दो ही परिवार थे और दोनों परिवारों से सारे लोगों ने वोट डाल दिए थे, इसलिए वह गांव भी शत-प्रतिशत वोटिंग की सूची में आ गया था। राज्य के निर्वाचन अधिकारी ने सिर पकड़ लिया लेकिन शेषन तो शेषन थे। बताते हैं कि इस घटना के बाद ही करीब से करीब मतदान केंद्र बनाए जाने का प्रस्ताव बना था।

मिलोगे तो नुकसान होगा
यूपी के एक कद्दावर नेता टीएन शेषन से मिलना चाहते थे। दिल्ली में उन्होंने कई बार मुलाकात फिक्स कराने की कोशिश की लेकिन हर बार शेषन अपने स्टाफ से पूछते थे कि नेता से पूछो, क्यों मिलना चाहते हैं? हर बार उनका स्टाफ यह कहता कि सर, वह यह तो नहीं बता रहे हैं लेकिन बस पांच मिनट आपसे बात करना चाहते हैं। यह सुनकर शेषन हर बार बोल देते थे कि उन्होंने क्या हमको इतना खाली समझ लिया है? यूपी के नेता की भी एक शर्त थी कि मुलाकात हो तो उनके कद के हिसाब से वन टू वन हो, साथ में कोई और न हो, इस शर्त पर शेषन का पारा और चढ़ चुका था। फिर उस नेता ने यूपी में राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अफसरों के जरिए मुलाकात की कोशिश की। अफसरों को आज की तारीख में जो याद है, उसके मुताबिक शेषन ने कहा कि उस नेता को बता दिया जाए कि उनसे मुलाकात का कोई फायदा नहीं होगा। हो सकता है, फायदे की जगह नुकसान ही हो जाए। एक पार्टी के नेता के रूप में उनसे वह पूर्व निर्धारित अजेंडे पर बात करने को कभी भी राजी हैं लेकिन उनके पास ‘व्यक्तिगत मुलाकात’ जैसा कोई फंडा नहीं है। यह मुलाकात फिर नहीं ही हो सकी लेकिन पूरे घटनाक्रम ने शेषन के दिमाग में एक नया आयडिया डाल दिया। उन्होंने हिंदी बेल्ट के राज्यों में प्रभावशाली नेताओं के होमटाउन और उसके आसपास के जिलों में वोटिंग पैटर्न और बिहेवियर पैटर्न पर रिसर्च कराने का फैसला किया। इसके बाद मतदान केंद्रों के बदलाव से लेकर संबंधित गांवों को दूसरे गांवों में जोड़ने का काम शुरू हुआ। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शेषन ने कहा भी था कि उन्हें इस तरह की जानकारी मिली है कि जिन गांवों से प्रभावशाली नेताओं को वोट मिलने की उम्मीद कम होती है, वहां के लोगों को वे वोट डालने के लिए निकलने ही नहीं देते और अपने प्रभाव वाले इलाकों के मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग कराते हैं।

साफगोई की हद
यूपी के एक राज्य निर्वाचन आयुक्त हुआ करते थे- अपरिमिता प्रसाद सिंह। एक वक्त आईएएस संवर्ग की वरिष्ठता सूची में सबसे सीनियर थे लेकिन उन्हें मुख्य सचिव बनने का मौका नहीं मिल सका। बाद में राजनाथ सिंह के नेतृत्व में बनी बीजेपी सरकार में उन्हें राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाया गया। राज्य निर्वाचन आयोग का काम स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव कराने का होता है। उन्होंने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहकर तत्कालीन बीजेपी सरकार को शर्मिंदगी का अहसास कराया कि उन्हें मुख्यसचिव न बनाकर उनके साथ जो नइंसाफी की गई थी, उसका प्रायश्चित करने को उन्हें राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाया गया है। यह वह दौर था, जब निजी कंपनियां मोबाइल फोन के क्षेत्र में आ रही थीं। एक टेलीफोन कंपनी के विज्ञापन में दिखने वाले श्वान चर्चा में हुआ करते थे। उसी ब्रीड के दो श्वान राज्य निर्वाचन आयुक्त ने भी पाल रखे थे। पाल रखने में कोई अजूबा नहीं था, अजूबा यह था कि वह उन्हें अपनी कार से रोजाना ऑफिस लाते थे। चूंकि पूरे स्टाफ को यह मालूम हो चुका था कि दोनों श्वान कमिश्नर साहब को बहुत प्रिय हैं तो उनमें दोनों से प्यार करने की होड़ दिखती थी। कई मौकों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस श्वानों पर ही केंद्रित हो जाती थी लेकिन यह वह दौर था जब सोशल मीडिया की पैदाइश नहीं हुई थी, वर्ना एक निर्वाचन आयुक्त की ‘श्वान प्रेम’ की कहानी किसी अंजाम तक जरूर पहुंच जाती। उस वक्त के राज्य के जितने भी वरिष्ठ राजनीतिक नेता थे, सबके साथ उनकी घनिष्ठता भी जमकर थी। कई बार संबंधित पार्टियों के दूसरे नेता जब अपनी शिकायत लेकर पहुंचते और माहौल में गर्मा-गर्मी आ जाती तो वह उस पार्टी के सीनियर लीडर को फोन लगाकर बतियाने लग जाते और माहौल अपने आप ठंडा हो जाता।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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