Sunday, June 13, 2021

नई वैक्सीनेशन पॉलिसी से कोई जादू होगा?

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लेखकः विवेक सिंह
21 जून से देश में नई वैक्सिनेशन पॉलिसी लागू हो जाएगी, जिसमें 18 वर्ष से अधिक उम्र के 94 करोड़ लोगों को मुफ्त में टीके दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जून को इस पॉलिसी का ऐलान किया। इसके मुताबिक, वैक्सीन कंपनियों से केंद्र सरकार 75% टीके खरीदेगी, जबकि 25% टीके प्राइवेट अस्पताल सीधे इन कंपनियों से खरीद सकते हैं। निजी अस्पताल वैक्सीन की कीमत के अतिरिक्त 150 रुपये तक सर्विस चार्ज ले सकते हैं। निजी अस्पतालों में कीमतों की निगरानी का जिम्मा राज्य सरकारों को दिया गया है।

सवा महीने में बदली नीति
एक अनुमान के मुताबिक देश में 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 94 करोड़ है। इनके लिए 188 करोड़ टीकों की आवश्यकता होगी। केंद्र ने मई 2021 से वैक्सिनेशन पॉलिसी में परिवर्तन किया था, जिसके तहत राज्य सरकारों को 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए 25% टीकों की व्यवस्था स्वयं करनी थी। राज्यों को इसमें कई परेशानियां आईं। कई राज्यों को ग्लोबल टेंडर देने के बाद भी टीके नहीं मिले। इसके बाद राज्यों ने केंद्र पर टीके देने का दबाव बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की टीका नीति पर सवाल उठाए। आखिर में केंद्र ने उनकी बात मान ली, जिसका ऐलान 7 जून को प्रधानमंत्री ने किया।

हैदराबाद में विशेष टीकाकरण मुहिम (फोटोः AP)

अब प्रश्न उठता है कि सवा महीने में ही केंद्र ने पुरानी टीकाकरण नीति को बदल क्यों दिया? जब केंद्र को पता था कि जुलाई अंत तक पर्याप्त मात्रा में टीके उपलब्ध नहीं हैं तो 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीकाकरण में शामिल करने की क्या आवश्यकता थी? 35 से 44 वर्ष के लोगों को इसमें शामिल किया जा सकता था। इतनी हड़बड़ी में फैसला क्यों लिया गया इस पर भी प्रश्न उठता है। अचानक राज्यों को 25% टीके खरीदने को कह दिया गया, जबकि पर्याप्त मात्रा में टीके उपलब्ध ही नहीं थे।

सरकार के मुताबिक 31 जुलाई तक 54 करोड़ टीके उपलब्ध होंगे। अभी तक 23 करोड़ टीके लगाए जा चुके हैं। आगामी 53 दिनों में केंद्र के पास 31 करोड़ नए टीके उपलब्ध होंगे। इस अवधि के दौरान 18+ आयु के लोगों का टीकाकरण अभियान चलाया जा सकता है। इस वजह से भी नई नीति 21 जून से लागू की जा रही है।

अगस्त से दिसंबर के बीच 153 दिनों में 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों के टीकाकरण के लिए देश को 134 करोड़ वैक्सीन डोज की आवश्यकता होगी। प्रतिदिन लगभग 88 लाख टीके लगाने की आवश्यकता होगी। अगस्त से दिसंबर के बीच कोविशील्ड के 50 करोड़ टीके, कोवैक्सीन के 38 करोड़, बायोलॉजिकल ई के 30 करोड़, नोवावैक्स के 20 करोड़, स्पूतनिक वी के 10 करोड़, जायकोव डी के 5 करोड़ (कुल 153 करोड़ टीके) सरकार को मिल सकते हैं। इस लिहाज से टीकों की पूर्ति इसकी मांग से अधिक है। भूलना नहीं चाहिए कि इसमें से कुछ प्रतिशत टीकों की बर्बादी भी होगी।

इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण को मद्देनजर रखते हुए केंद्र ने बजट में 35,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। अभी तक इसमें से 4,000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, शेष 31,000 करोड़ का इस्तेमाल इसमें किया जा सकता है। टीकों की मांग और कीमतों के बढ़ने की दशा में केंद्र टीकाकरण के लिए आवंटित राशि को 45,000-50,000 करोड़ तक कर सकता है। फिलहाल 188 करोड़ टीकों का 75% यानी 141 करोड़ टीकों के लिए केंद्र को 150 रुपये प्रति टीके के हिसाब से भुगतान करना होगा। इसके लिए लगभग 25,000 करोड़ रुपये चाहिए। शेष 25% यानी 47 करोड़ टीकों की खरीद निजी अस्पतालों को करनी है।

कोविशील्ड और कोवैक्सीन की एक डोज जहां सरकार को 150 रुपये की पड़ रही है, वहीं निजी अस्पतालों को इनके लिए क्रमश: 600 और 1200 रुपये चुकाने होंगे। इसमें निजी अस्पताल 150 रुपये का सर्विस चार्ज ले सकते हैं। लिहाजा कोविशील्ड की एक डोज के लिए निजी अस्पतालों में कम से कम 750 रुपये चुकाने होंगे, जबकि कोवैक्सीन के लिए 1,350 रुपये। ऐसा उस स्थिति में होगा, जब सब नियमों के अनुसार होता है।

निजी अस्पतालों को 25% टीकाकरण की जिम्मेदारी सौंपने से सरकारी हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का दबाव कम होगा। लेकिन एक तरफ देश के लोगों को वैक्सीन मुफ्त में मिलेगी तो दूसरी तरफ उसी देश के लोगों को इसके लिए 750 से 1350 रुपये चुकाने होंगे। जब सरकार को वैक्सीन कंपनियां 150 रुपये प्रति डोज के हिसाब से सप्लाई कर रही हैं तो निजी अस्पतालों को इतनी अधिक कीमत पर क्यों?

देश में 3 करोड़ लोग हैं जो टैक्स देते हैं। अभी कोरोना महामारी के कारण उनकी संख्या आधी हो गई है। कोरोना जैसी महामारी की स्थिति में देश में मिलने वाले टीके की कीमत में समानता होनी चाहिए, चाहे वह केंद्र सरकार खरीदे या प्राइवेट अस्पताल। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।

वैक्सीन की सप्लाई बढ़ेगी
अप्रैल के महीने में 43 लाख टीके 1 दिन में लगाए जा चुके हैं। एक दिन में 1 एक करोड़ टीके भी लगाए जा सकते हैं। इसके लिए हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को इंप्रूव करना होगा, छोटे-बड़े निजी और सरकारी अस्पतालों, डॉक्टरों, आशा वर्कर्स को जोड़ना होगा। फाइजर, मॉडर्ना, जॉनसन एंड जॉनसन जैसी विदेशी कंपनियों से भारत सरकार का करार होने पर वैक्सिनेशन की रफ्तार और बढ़ सकती है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में वैक्सीन की बर्बादी के प्रतिशत को कम करना पड़ेगा। जनसंख्या के अनुपात में राज्य सरकारों को टीके उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। अभी कोविशील्ड और कोवैक्सीन को मिलाकर 15-16 करोड़ डोज प्रतिमाह उत्पादन हो रहा है। जुलाई के अंत तक दोनों वैक्सीन का उत्पादन 22-25 करोड़ तक हो सकता है। इसी दौरान बायोलॉजिकल ई से भी वैक्सीन मिलनी शुरू हो जाएगी, जिसके लिए भारत सरकार ने पहले ही 30 करोड़ का ऑर्डर दे रखा है। ऐसे में अगस्त से सरकार के पास इतनी वैक्सीन हो जाएगी कि प्रतिदिन एक करोड़ के आसपास टीके देशवासियों को दिए जा सकेंगे। आबादी के लिहाज से इतने बड़े देश में टीकाकरण के लिए समूची व्यवस्था बनाने में समय लगता है। बिना समाज, राज्य सरकारों और विपक्षी पार्टियों के सहयोग से टीकाकरण के लक्ष्य को नहीं प्राप्त किया जा सकता। सभी को टीकाकरण को लेकर जागरूकता फैलाने और टीकाकरण में सरकार के सहायक के रूप में नजर आना चाहिए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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