Saturday, May 15, 2021

नेताओं की जेब में कब तक रहेगा फेसबुक

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लेखकः रवि शंकर
फेसबुक पर आरोप लगा है कि उसने दुनिया भर में 25 से अधिक देशों में नेताओं को अनैतिक बढ़ावा दिया। इसका इस्तेमाल इन देशों में नेताओं ने जनता को बरगलाने और अपने विरोधियों को परेशान करने में किया। इसी महीने ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्डियन’ ने एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट प्रकाशित कर कहा कि उसके हाथ फेसबुक के इस अनैतिक काम के ढेरों कागजात भी लगे हैं।

अखबार ने इस बात का खुलासा फेसबुक की पूर्व डेटा साइंटिस्ट सोफी झांग के हवाले से किया है। झांग को जनवरी 2018 में फेसबुक ने फेक इंगेजमेंट रोकने के लिए रखा था, पर सितंबर 2020 में खराब प्रदर्शन के बहाने उनको नौकरी से निकाल दिया गया। झांग की मदद से हुए इन्वेस्टिगेशन में पता चला कि किस तरह से फेसबुक ने अमेरिका या बाकी के अमीर देशों को प्रभावित करने के लिए गरीब, छोटे और गैर-पश्चिमी देशों के नेताओं को अपने प्लैटफॉर्म का दुरुपयोग करने दिया।

जांच में पता चला कि कंपनी ने अमेरिका जैसे देशों में राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाले मुद्दों पर तत्परता दिखाई, लेकिन अफगानिस्तान, अजरबैजान, इराक, मंगोलिया, मैक्सिको और लैटिन अमेरिका के देशों के मामलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं किया। अजरबैजान की प्रोफाइलों की जांच में दिखा कि किस तरह से इन देशों में फेसबुक ने एक खास पार्टी के लोगों को अलग-अलग नाम से ढेरों प्रोफाइल बनाने दी। उन प्रोफाइलों से राजनीतिक विरोधियों के स्टेटस पर जाकर एक ही तरह के सैकड़ों कॉमेंट्स किए गए। सोफी झांग के मुताबिक इन देशों में फेसबुक ने सारी एक्टिविटी को बेहद गोपनीय रखा, ताकि कोई इसके बारे में न जान पाए, न इसका इलाज कर पाए।

झांग ने 2016 के अमेरिकी चुनाव का भी जिक्र किया, जिसमें वोटरों को बांटने के लिए फेसबुक के खिलाफ कई तरह के जोड़तोड़ के सबूत दिए गए थे। इतना ही नहीं उन्होंने सेंट्रल अमेरिकी देश होंडुरास का हवाला देते हुए बताया कि यहां के राष्ट्रपति जुआन अर्नाल्डो हर्नांडेज ने 2018 में अपने समर्थन में 90 फीसदी से ज्यादा फेक इंगेजमेंट अपने ही दफ्तर से पोस्ट करवाए थे। उनका पूरा दफ्तर फेक लाइक्स और कॉमेंट्स में जुटा था। इसकी संख्या लाखों में थी।

झांग के मुताबिक उन्होंने भारत सहित अल्बानिया, मैक्सिको, अर्जेंटीना, इटली, फिलीपींस, अफगानिस्तान, दक्षिण कोरिया, बोलिविया, इक्वाडोर, इराक, ट्यूनीशिया, तुर्की, ताइवान और यूक्रेन में इसी तरह की हरकतें नोट कीं और इसकी शिकायतें भी कीं। इन शिकायतों के बावजूद फेसबुक को इन चीजों से निजात पाने में सवा साल से डेढ़ साल तक का वक्त लग गया, जबकि वह चाहता तो यह चंद मिनटों का काम था।

हालांकि फेसबुक की ऐसी हरकतें पहली बार सामने नहीं आई हैं। पहले इसका डेटा कैंब्रिज एनालिटिका जैसी थर्ड पार्टी एजेंसी के जरिए लीक होता था, पर अब तो कंपनी खुद यूजर्स की बिना पूछे ही जासूसी करने लगी है। इस पूरे प्रकरण पर फेसबुक की प्रवक्ता लिज बोर्गीज का कहना है कि सोफी ने जो कुछ भी कहा है, उससे वह पूरी तरह से असहमत हैं और कंपनी अपने प्लैटफॉर्म पर इस तरह की हरकतें नहीं होने देती है।

बहरहाल, राजनीतिक और कारोबारी हितों को साधने के लिए डेटा और सोशल मीडिया का दुरुपयोग काबू से बाहर होता जा रहा है। इस जांच में भारत का भी नाम है, पर अपने यहां अभी तक इसके लिए न तो कोई कड़ा कानून है, न ही ऐसा कोई संस्थान, जो डेटा की गोपनीयता को सुरक्षित रखता हो। सरकार केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-43 (ए) के तहत डेटा संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश देती है। डेटा प्रोटेक्शन बिल अभी तक लोकसभा में ही अटका हुआ है।

सोफी झांग के मुताबिक जिन 25 देशों में फेसबुक ने नेताओं के साथ मिलकर यह सब किया, उनके यहां भी डेटा प्रोटेक्शन का हाल खराब है। ऐसे में टेक कंपनियों को भारत और तीसरी दुनिया के देशों में किसी तरह के कानून का खौफ नहीं रह गया है और यही वजह इन देशों को उनका आसान टारगेट बना रही है। जबकि यूरोपियन यूनियन और अमेरिका जैसी जगहों पर प्राइवेसी से जुड़े कड़े कानून मौजूद हैं, फेसबुक जैसी तमाम कंपनियों को उनका पालन करना पड़ता है, इसलिए वे उन देशों में ऐसी हरकतें नहीं कर पाते।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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