Sunday, April 11, 2021

पंजाब में मजदूरों को नशे की लत मार रही है या कमाई की लूट

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लेखकः अरविन्द मोहन
पांच राज्यों की चुनावी गहमा-गहमी के बीच भी पंजाब में प्रवासी मजदूरों को नशीली दवाओं के सहारे बंधुआ बनाने और उनसे बेहिसाब मजदूरी कराने संबंधी खबर को मीडिया में प्रमुखता मिली तो इसके पीछे कहीं न कहीं यह तथ्य भी है कि लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के गांवों की ओर पलायन की त्रासदी हमारी सामूहिक स्मृति से मिटी नहीं है। हालांकि पंजाब में नशाखोरी एक बड़ी समस्या है। हैरानी की बात यह भी है कि सबसे ज्यादा प्रचलित शराबखोरी पर चर्चा भी नहीं होती, जबकि अफीम और नशीली दवाओं वाले पक्ष की चर्चा ऐसे होती है, जैसे वे सारी बुराइयों की जड़ हों। पंजाब जाकर कितने मजदूर शराबखोरी की लत लगा लेते हैं, इसका भी हिसाब हो तो समझ आए कि नशीली दवाओं वाला ‘रोग’ असल में कितना गंभीर है और इसका दायरा कितना फैला हुआ है। यह भी कि जब ऐसा रोग समाज के कमजोर और अपनी जमीन से दूर दूसरी जगह आए लोगों को लगता है या लगाया जाता है तो उसका रूप कितना डरावना होता है।

बीएसएफ की रिपोर्ट
आज से करीब 27-28 साल पहले जब मैं पंजाब गए बिहारी मजदूरों की स्थिति पर शोध कर रहा था, तब भी यह सवाल उठता था। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस बारे में रिपोर्ट मांगे जाने के बाद अब उम्मीद की जानी चाहिए कि पंजाब सरकार राजनीतिक रंग दिए बगैर इस मसले पर गंभीरता से आगे बढ़ेगी। केंद्र ने अपने निर्देश के साथ सीमावर्ती जिले से बीएसएफ द्वारा 2019 और 2020 में छुड़ाए गए ऐसे 58 बंधुआ मजदूरों का हवाला भी दिया है। उसके अनुसार फिरोजपुर, गुरदासपुर, अमृतसर और अबोहर के सीमावर्ती जिले इस मर्ज से ज्यादा ग्रसित हैं। वैसे जब यह बीमारी लगी है तो मामले वहीं तक सीमित नहीं होंगे। लेकिन बीएसएफ की पहुंच सीमावर्ती इलाकों तक ही होगी। दूसरी बात यह कि कार्यक्षेत्र की सीमा को देखते हुए उसकी मजबूरी ऐसे लोगों को पंजाब पुलिस के हवाले करने की है। जहां तक सवाल पंजाब पुलिस का है तो वह अगर इसे लेकर गंभीर होती तो बात शायद इतनी बढ़ती ही नहीं।

पटियाला के पास एक गांव में गेंहू की कटाई करता एक मजदूर (PTI)

ऐसी खबरें अक्सर अखबारों में भी मिलती हैं और जब-तब आसपास के लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में भी सामने आती हैं कि जब बिहारी/पुरबिया मजदूर बाहर से पैसे कमाकर आता है तो ट्रेन में या बस में बदमाश उसे खास किस्म का जहर देकर बेहोश कर देते हैं और फिर उसकी सारी कमाई, कपड़े-लत्ते पर हाथ साफ कर लेते हैं। पंजाब से आने वाली गाड़ियां बिहार के अपने अंतिम पड़ाव (सहरसा, पूर्णिया, दरभंगा, भागलपुर) पहुंचती हैं तो रेल पुलिस के लोग ठेला लेकर जाते हैं कि डिब्बों में दो-चार बेहोश लोग मिलेंगे ही। उन्हें लादकर बाहर लाने के बाद किसी तरह अता-पता करके उनके रिश्तेदार या परिचित के हवाले करते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अखबारों में एक पद चलता है ‘जहरखुरानी’। यह चेतावनी रेलवे ने अपने डिब्बों में भी चिप्पी चिपकाकर दी है कि ‘जहरखुरानी गिरोह से सावधान’।

मैंने जब अध्ययन किया था तब ज्यादातर मजदूर अपनी कमाई कैश लेकर घर लौटते थे। यह भी आम था कि एक मजदूर घर जा रहा हो तो दूसरे कई मजदूर उसे अपनी कमाई भी गांव पहुंचाने के लिए सौंप देते थे। तब बैंक से ड्राफ्ट बनवाकर पैसे भेजना भी आम था और डाकघर से मनीऑर्डर से भी। लेकिन डाकघरों और बैंकों में उन्हें तय दर से ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते थे। अनपढ़ मजदूरों की मदद के नाम पर फायदा उठाने वाले दलाल भरे रहते थे। मजदूर कैश लाने के भी बहुत नायाब तरीके अपनाते थे। लंगोट और अंडरवियर से लेकर मोजों तक के अंदर पैसे रखे जाते थे। इसके लिए बड़े नोट सुविधाजनक होते थे जो सहृदय मालिक उपलब्ध करा देते थे। कुछ पैसे ज्यादा देने पर ये बाजार से भी मिल जाते थे। लेकिन यह बात जहरखुरानी वाले बदमाश भी जानते थे। इसलिए बेहोश मजदूरों का कच्छा तक उतारकर पैसे ढूंढ़ते थे।

आज पैसा भेजने के बहुत तरीके आ गए हैं लेकिन अनपढ़ और धुर देहात के मजदूरों को ही नहीं, आम मध्यमवर्गीय नागरिकों को भी कैश रखना और लेना सुविधाजनक लगता है। सो वापसी की यात्रा में मजदूरों को नशा खिलाकर लूटने का यह धंधा जारी है।

बहरहाल, पंजाब में प्रवासी मजदूरों में नशे का ‘प्रकोप’ तब ऐसा नहीं प्रतीत हुआ था, जैसा उसे आज बताया जाता है। हां, बिहार के गांवों में पुराने जमींदार परिवारों के लोग (जिनका काम मजदूरों के पलायन से प्रभावित हुआ था) जरूर यह कहते मिले कि पंजाब में मजदूरों को अफीम चटा कर उनसे ज्यादा काम लिया जाता है।

मैं जब अपना अध्ययन खत्म करके पत्रकारिता में लौट रहा था, तब चंडीगढ़ की एक संस्था ने फिर से पंजाब में काम करने का प्रस्ताव दिया। काम था एड्स और नशे के असर के अध्ययन का। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुझे पंजाब में कॉल-गर्ल का धंधा चलने की झलक तो कई जगह दिखी, लेकिन वेश्यावृत्ति का एक भी अड्डा सुनाई नहीं दिया। वजह शायद यह थी कि मजदूर पिंग-पांग बॉल की तरह लगातार घर से पंजाब आते-जाते रहते। दूसरी बात यह कि वे अक्सर इस तरह से समूह में रहते और काम करते हैं कि किसी ने जरा सी गड़बड़ की नहीं कि गांव और परिवार तक बदनामी पहुंच जाने का डर रहता है।

माइग्रेशन और एड्स
जाहिर है, ऐसे में माइग्रेशन और एड्स का रिश्ता ऊपर से चाहे जितना गहरा लगता हो, पंजाब में जमीनी हकीकत से मेल खाता मुझे नहीं दिखा। दूसरे, अफीम वाला पक्ष जरूर ध्यान खींच रहा था, लेकिन उसमें भी अलग अध्ययन करने लायक तथ्य नहीं मिले। मजदूरों के पलायन का कारण, उनका और उनके गांव में रह रहे परिवार का हाल, उनकी यात्रा की अमानवीय परिस्थितियां और उनकी कमाई की लूट- ये सवाल तब भी बहुत बड़े थे और आज भी लगते हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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