Tuesday, December 1, 2020

प. बंगाल की 292 विधानसभा सीटों में 200 पर जीत का लक्ष्य, क्या अमित शाह का सपना पूरा कर पाएगी बीजेपी?

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इसमें कोई शक-सुबहे की गुंजाइश नहीं है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी लगातार मजबूत हो रही है। 2009 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ दार्जिलिंग सीट पर कब्जा कर पाने में सफल रही बीजेपी को अगले 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक सीट ज्यादा मिली। भले ही बीजेपी को दो लोकसभी सीटों पर ही जीत मिली, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में बड़ा इजाफा हुआ। आइए विस्तार से जानते हैं प. बंगाल में बीजेपी की मजबूती की कहानी…

​बीजेपी के वोट शेयर में बढ़ोतरी

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीजेपी बंगाल में एक बढ़ती हुई ताकत है। 2016 के विधानसभा चुनावों में भी इसका वोट शेयर 10.3% बढ़ा था जो कांग्रेस के 12.4% के करीब था। विधानसभा सीटों के लिहाज से पार्टी ने 294 में से सिर्फ तीन पर जीत हासिल की थी लेकिन 2011 के चुनाव से तुलना करें तो यह एक अच्छी कामयाबी थी, खासकर एक ऐसी पार्टी के लिए जो किसी राज्य में अपनी जमीन की तलाश में हो। 2011 विधानसभा चुनाव में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था और वोट शेयर भी सिर्फ 4% के करीब था।

बीजेपी और टीएमसी में सिर्फ 17 लाख वोटों का फासला

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वर्ष 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 211, लेफ्ट को 33, कांग्रेस को 44 और बीजेपी को मात्र 3 सीटें मिली थीं। वोट शेयर में भी बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है। टीएमसी ने जहां 43.3 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया वहीं बीजेपी को 40.3 प्रतिशत वोट मिले। बीजेपी को कुल 2 करोड़ 30 लाख 28 हजार 343 वोट मिले जबकि टीएमसी को 2 करोड़ 47 लाख 56 हजार 985 मत मिले हैं।

टीएमसी को झटका दे बढ़ रही बीजेपी

विधानसभावार चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 28 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त म‍िली थी जबकि 2019 के चुनाव में 128 क्षेत्रों में ‘कमल’ खिला है। उधर, साल 2014 में 214 क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने वाली टीएमसी अब केवल 158 क्षेत्रों में सिमटकर रह गई है।

बीजेपी का उभार और वामपंथ का पटाक्षेप

सूबे में बीजेपी का जैसे-जैसे उभार हुआ, इसका सबसे ज्यादा नुकसान सीपीएम को झेलना पड़ा, जिसका कभी सूबे की सत्ता पर लगातार 3 दशकों तक एकछत्र राज था। 2014 के लोकसभा और 2016 के विधानसभा चुनावों में सीपीएम का वोट शेयर 10 प्रतिशत या इससे भी ज्यादा गिरा था। बाद के चुनावों में बीजेपी के प्रदर्शन में और सुधार हुआ। निगम चुनावों में दुर्गापुर और नादिया के कूपर्स कैंप जैसी जगहों पर पार्टी दूसरे पायदान पर रही और 2018 के पंचायत चुनाव में यह टीएमसी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरी। यहां तक कि बीजेपी का प्रदर्शन सीपीएम और कांग्रेस दोनों के संयुक्त प्रदर्शन से भी बेहतर था।

​लेफ्ट और कांग्रेस का वोट बैंक तबाह

बीजेपी कई अन्य सीटों पर अपनी जमीन मजबूत करने और टीएमसी के स्तर की संगठनात्मक क्षमता हासिल करने के लिए खूब पसीना बहाया है। इसने लेफ्ट और कांग्रेस के वोट बैंक को तबाह कर दिया है लेकिन टीएमसी के चढ़ते वोट शेयर में अभी भी सेंध नहीं लगा पाई है। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी लहर चरम पर थी तब 12 सीटों पर ही बीजेपी का वोट शेयर 20 प्रतिशत या इससे ज्यादा था। बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद से बीजेपी अक्सर विपक्ष को ‘भारत विरोधी’ और ‘पाकिस्तान समर्थक’ ठहराती रही है।

​ममता की टीएमसी के पास सबसे ज्यादा वोट शेयर

चुनाव दर चुनाव बीजेपी भले ही अपने प्रदर्शन में सुधार कर रही है और सीपीएम और कांग्रेस को पछाड़ती हुई दिख रही है लेकिन उसका असली सिरदर्द ममता की टीएमसी है। टीएमसी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 40 प्रतिशत वोटों पर कब्जा किया था और 2 साल बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 45.3 प्रतिशत रहा। दोनों ही चुनावों में टीएमसी ने अपने वोट शेयर में शानदार इजाफा किया और बंगाल में अपना दबदबा और भी मजबूत किया। अभी सूबे की 42 लोकसभा सीटों में से टीएमसी के खाते में 34 और विधानसभा की 294 सीटों में से 211 पर उसका कब्जा है।

​2015 का नगर निकाय चुनाव

2015-

91 में से एक भी नगर निगम में बीजेपी को कामयाबी नहीं मिली जबकि इस मामले में कांग्रेस का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर रहा है और उसने पांच नगर निगमों में जीत हासिल की। वहीं, लेफ्ट ने 6 नगर निगमों पर कब्जा जमाया। इसी तरह कोलकाता नगर निगम में बीजेपी सिर्फ 7 सीटें जीत सकी जबकि लोकसभा चुनाव में ही उसने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी।

​गांवों में भी बढ़ी बीजेपी की ताकत

2018 के पंचायत चुनावों में सत्तारूढ़ टीएमसी ने क्लीन स्वीप कर लिया था लेकिन बीजेपी ने दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी। राज्य में कुल 31,802 ग्राम पंचायत सीटों में से टीएमसी ने 20,848 पंचायत सीटों पर कब्जा जमाया था जबकि बीजेपी के हिस्से 5,657 सीटें आईं। सीपीएम ने 1,415 उम्मीदवार और कांग्रेस महज 993 ग्राम पंचायत सीटें ही जीत सकी। दिलचस्प तथ्य यहै है कि इन दोनों पार्टियों से ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवारों ने 1,741 पंचायत सीटों पर जीत हासिल की।

​2018 के उपचुनाव में भी बीजेपी दूसरे नंबर

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29 जनवरी, 2018 को पश्चिम बंगाल की नवपाड़ा विधानसभा और उलुबेरिया लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। दोनों पर टीएमसी ने जीत हासिल की, लेकिन दोनों सीटों पर बीजेपी को सीपीएम से ज्यादा वोट मिले। यानी साफ है कि बीजेपी लगातार सीपीएम और कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल कर रही है। स्पष्ट है कि राज्य में बीजेपी का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में बीजेपी अगर अगले साल विधानसभा चुनाव के लिए 292 में 200 सीटें का लक्ष्य लेकर चल रही है तो इसे असंभव नहीं माना जा सकता।

​कैसे 1 से 18 लोकसभा सीटों तक पहुंची बीजेपी?

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दरअसल, 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही बीजेपी की नजर पश्चिम बंगाल पर है। इस राज्य में पार्टी को मजबूत करने के लिए खुद अमित शाह ने कमर कसी हुई है। उन्होंने 2019 में 42 लोकसभा सीटों में 22 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था और 18 सीटें जीतने में सफल भी रहे। राज्य में पार्टी की साख बढ़ाने के लिए बीजेपी सालोंभर कुछ ना कुछ कार्यक्रम करती रहती है। उसके कार्यकर्ता ममता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने का एक भी मौका नहीं गंवाते। इतना ही नहीं बीजेपी ने टीएमसी के दिग्गत नेता मुकुल राय को भी अपने साथ मिला। पार्टी भांप चुकी है कि राज्य में अपनी ताकत बढ़ानी है तो वहां मुस्लिमों को भी साथ लेना होगा क्योंकि राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद है। यही वजह है कि राज्य में बीजेपी ने मुस्लिम सम्मेलन किय।

यूं प. बंगाल में बढ़ती गई बीजेपी

2009 का लोकसभा चुनाव – 6.1% वोट – एक सीट (दार्जिलिंग)

2011 का विधानसभा चुनाव – 4% वोट – खाता नहीं खुला

2014 का लोकसभा चुनाव – 16.8% वोट – दो सीटें

2016 का विधानसभा चुनाव – 10.3% वोट – तीन सीटें

2019 का लोकसभा चुनाव – 41% वोट – 18 सीटें

20015 का नगर निकाय चुनाव – बीजेपी को एक भी नगरपालिका में जीत नहीं मिली, कांग्रेस का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर

2017 का नगर निकाय चुनाव – कांग्रेस और सीपीएम के संयुक्त प्रदर्शन से बेहतर, टीएमसी के बाद दूसरा स्थान

2018 का पंचायत चुनाव – टीएमसी के बाद बीजेपी दूसरे स्थान पर



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