Saturday, May 15, 2021

ममता को मोदी का शुक्रगुजार होना चाहिए

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लेखकः वेदप्रताप वैदिक
देश के पांच अहिंदीभाषी राज्यों के चुनाव-परिणाम के सबक क्या-क्या हैं? पहला सबक तो यही है कि भारत विविधतामय लोकतंत्र है। अब यहां ‘एक पार्टी और एक नेता का राज’ नहीं चल सकता। बीजेपी असम में जरूर जीती है, लेकिन तीन बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में हार गई है। पुडुचेरी में वह जीते हुए गठबंधन की सदस्य भर है। पश्चिम बंगाल में उसका 200 सीटों का दावा हवाई किला भर बनकर रह गया है। केरल में उसने मेट्रोमैन श्रीधरन को भी दांव पर लगा दिया, लेकिन उसकी पहले जो एक सीट थी, वह भी वह हार गई। दूसरे शब्दों में अब केंद्र की बीजेपी सरकार को उत्तर और दक्षिण की सशक्त विपक्षी सरकारों के साथ ताल-मेल की राजनीति चलानी पड़ेगी। अपनी दादागीरी चलाना मुश्किल होगा।

दूसरी बात यह कि बीजेपी बंगाल में हारी जरूर है, लेकिन उसे 72 सीटों पर विजय मिली है। बंगाल और असम जैसे अहिंदीभाषी और सीमावर्ती प्रांतों में बीजेपी का इतना वर्चस्व आखिर किस बात का प्रतीक है? लंबे काल तक बीजेपी विपक्षी और हिंदी-क्षेत्रीय पार्टी रही है। इन नए क्षेत्रों में उसका बढ़ना क्या राष्ट्रीय एकता की बढ़त का प्रतीक नहीं है? यह बढ़त बीजेपी के अपने चरित्र और दृष्टि का विस्तार किए बिना नहीं रहेगी।

चुनाव नतीजों के अगले दिन कोलकाता के काली घाट मंदिर पहुंची ममता बनर्जी। (फोटोः ANI)

कांग्रेस का पिछड़ना
बहरहाल, कांग्रेस का लगभग सभी राज्यों में पिछड़ जाना राष्ट्र की राजनीतिक एकता की दृष्टि से ठीक नहीं है। यह उसके नेतृत्व और नीति की कमजोरी तो दर्शाता ही है, लेकिन इतने विशाल भारत को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए शक्तिशाली फौज और मजबूत सरकार के साथ एक सुसंगठित अखिल भारतीय पार्टी का होना भी जरूरी है। कम्युनिस्ट पार्टी के कमजोर पड़ने पर बलशाली सोवियत संघ टुकड़े-टुकड़े हो गए थे या नहीं?

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में डीएमके और केरल में मार्क्सवादी पार्टी की प्रचंड विजय उनकी शुद्ध लोकप्रियता और सेवा के आधार पर हुई है, लेकिन हम यह न भूलें कि तीनों राज्यों में कांग्रेस बहुत बुरी तरह से हारी है और बीजेपी भी पिछड़ गई है। दूसरे शब्दों में अखिल भारतीय पार्टियों की बजाय प्रांतीय पार्टियों का झंडा बुलंद हुआ है। यानी इन राज्यों में बांग्ला, तमिल और मलयाली उप-राष्ट्रवाद प्रबल हुआ है। केंद्र सरकार को इन तीनों राज्यों के साथ बहुत सावधानी के साथ पेश आना होगा।

इन चुनावों ने यह भी सिद्ध किया है कि सांप्रदायिकता की तुरुप का पत्ता कभी-कभी उलटा पड़ जाता है। असम में जहां नागरिकता के सवाल को दरी के नीचे खिसकाना पड़ा, वहीं बंगाल में बीजेपी को हिंदुओं के थोक वोट नहीं मिल पाए। वे बंट गए। अल्पसंख्यकों को उनका डर उन्हें ममता के साथ खींच ले गया और हिंदू वोट को बांटने में बांग्ला और गैर-बांग्ला वाद की बड़ी भूमिका रही। ममता बनर्जी ने बंगाली और बाहरी का भूत तो खड़ा किया ही, अपने आप को ब्राह्मण और आस्थावान हिंदू सिद्ध करने के लिए कौन-कौन सी नौटंकियों का सहारा नहीं लिया। इस खेल में मोदी पर दीदी भारी पड़ गईं। टूटी टांग और पहिएदार गाड़ी के प्रचार ने सारे देश का ध्यान खींच लिया। उधर, रवींद्रनाथ टैगोर के जैसी दाढ़ी और ढाका-यात्रा की नौटंकी भी किसी काम नहीं आई।

ममता बनर्जी को इस चुनाव ने बंगाल का अपूर्व नेता तो बना ही दिया, उनको अखिल भारतीय प्रचार भी दे दिया। इन पांचों राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा प्रचार बंगाल का हुआ, क्योंकि बीजेपी ने वहां जितनी जोर-आजमाई की, मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी प्रांतीय चुनाव में किसी केंद्रीय दल ने कभी ऐसी की है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री, पार्टी अध्यक्ष के अलावा दर्जनों मंत्री, मुख्यमंत्री, सैकड़ों सांसद, हजारों बाहरी कार्यकर्ता और अपार धनराशि बहाने के बावजूद बीजेपी ममता का बाल भी बांका नहीं कर पाई बल्कि ममता की सीटों और वोटों में बढ़ोतरी हो गई।

ममता को मिले अखिल भारतीय प्रचार ने उन्हें लगभग सारे विपक्षी प्रांतीय नेताओं का समर्थन दिलवा दिया। कई विपक्षी मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तृणमूल कांग्रेस को जिताने के लिए बंगाल पहुंच गए। क्या अब ये सब नेता ममता को मोदी के विरुद्ध सारे देश में घुमाने की कोशिश नहीं करेंगे? ममता को मोदी का आभार मानना चाहिए कि उन्होंने बंगाल के युद्ध में खुद को ममता के समकक्ष खड़ा कर लिया। बीजेपी के पास बंगाल में कोई मुख्यमंत्री का चेहरा ही नहीं था। उत्तर प्रदेश में खेला गया उसका यही पत्ता बंगाल में पिट गया।

यह असंभव नहीं कि अब ममता अगले तीन साल में देश के समस्त विपक्षी नेताओं को एकजुट करने में जुट जाएं। यह काम आसान नहीं है, क्योंकि कोरोना महामारी की वजह से चाहे आजकल केंद्र सरकार की छवि फीकी पड़ रही है लेकिन अभी भी मोदी की टक्कर का कोई अखिल भारतीय नेता उभरा नहीं है। ममता ने चुनाव के पहले भी कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश की थी।

अति भावुकता बनेगी बाधा
कांग्रेस और मार्क्सवादी पार्टी के लिए ममता को नेता मानना कई कारणों से कठिन होगा। यों भी भारत की सारी जनता में लोकप्रिय होने के लिए जो विशेषताएं आवश्यक हैं, उन्हें पता नहीं ममता अपने में विकसित कर पाएंगी या नहीं। उनकी अति भावुकता, उनकी अटपटी हिंदी व अंग्रेजी और उनकी भाषण-शैली करोड़ों गैर-बंगाली मतदाताओं को प्रभावित कर पाएगी या नहीं, यह कहना कठिन है। यदि देश की लगभग सभी प्रमुख पार्टियां मोदी-विरोधी गठबंधन बना लें और ममता को नेता मान लें तो हो सकता है कि कांग्रेसी और कम्युनिस्ट भी उसमें शामिल हो जाएं, फिर भी उसे जयप्रकाश नारायण जैसे किसी सर्वमान्य और निर्लिप्त नेता की जरूरत हो सकती है जैसी कि 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ हुई थी।

इस बीच यदि मोदी अपनी भूल से सबक लें और नौकरशाही पर पूरी निर्भरता से बचें, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तटस्थ न रहे और सत्तारूढ़ गठबंधन के करोड़ों कार्यकर्त्ता जन-सेवा में जुट जाएं तो अगले प्रांतीय चुनावों की वैतरणी को बीजेपी शायद पार कर ले जाए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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