Wednesday, April 14, 2021

म्यांमार पर ये क्या कर रहे हैं सरकार

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लेखकः पंकज चतुर्वेदी
मणिपुर सरकार को जनता के विरोध के आगे झुकना पड़ा। उसे वह आदेश तीन दिन में ही वापस लेना पड़ा, जिसमें पड़ोसी देश म्यांमार से भाग कर आ रहे शरणार्थियों को भोजन और आश्रय मुहैया कराने के लिए शिविर लगाने से मना किया गया था, लेकिन केंद्र के रुख में अभी भी इस मामले में एक तरह की दुविधा दिख रही है। अब तक हजार से ज्यादा शरणार्थी म्यांमार से भाग कर इस तरफ आ चुके हैं। इनमें से कई तो वहां की पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं के लोग हैं, जिन्होंने सैनिक तख्ता पलट का सरेआम विरोध किया था। अब जब म्यांमार की सेना हर विरोधी को गोली मारने पर उतारू है तो उन्हें अपनी जान बचाने को सबसे मुफीद जगह भारत ही दिख रही है।

रोहिंग्या के खिलाफ अभियान
भारत के लिए दुविधा की स्थिति इसलिए भी है क्योंकि उसी म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ यहां अभियान चलाया जाता रहा है। इस वजह से पूरे देश में उनके खिलाफ माहौल बन गया है। लेकिन अब जो शरणार्थी आ रहे हैं वे गैर-मुस्लिम हैं। यही नहीं, म्यांमार में रोहिंग्या के खिलाफ हिंसक अभियान चलाने वाले बौद्ध संगठन अब वहां की फौज के समर्थक बन गए हैं। म्यांमार के बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय में रोहिंग्या के खिलाफ नफरत का जहर भरने वाला अशीन विराथु अब उस सेना का समर्थन कर रहा है, जो निर्वाचित नेता आंग सांग सू की को गिरफ्तार कर लोकतंत्र को समाप्त कर चुकी है।

मिजोरम में एक शरणार्थी शिविर में थ्री फिंगर सैल्यूट देते म्यांमार पुलिस के जवान (AFP)

पूर्वोत्तर भारत से सटे पड़ोसी देश म्यांमार में सैनिक शासन शुरू होने के बाद से ही सैकड़ों बागी पुलिसवाले और दूसरे सुरक्षाकर्मी चोरी-छिपे मिजोरम आ रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग उन लोगों को सुरक्षित निकालने और इस तरफ पनाह देने के काम में लगा है। जान बचाने की चिंता में उस पार से आ रहे लोग लोग सीमा पर स्थित घने जंगलों को अपने निजी वाहनों जैसे, कार, मोटरसाइकिल आदि के सहारे या फिर पैदल ही पार कर रहे हैं। भारत में उनके लिए खाने-पीने और ठहरने-सोने की ही नहीं इलाज आदि की भी व्यवस्था करने के काम में कई संगठन जुटे हुए हैं।

मिजोरम से राज्‍यसभा सांसद के वनलालवेना बताते हैं कि म्यांमार पुलिस के कोई 280 कर्मचारी और फायर ब्रिगेड के 26 लोग इस तरफ आ गए हैं। म्यांमार से भागकर आने वाले ज्यादातर लोग 18 मार्च से 20 मार्च के बीच भारत में दाखिल हुए। सबसे अधिक शरणार्थी चंपई जिले में रह रहे हैं। कुल 324 चिह्नित शरणार्थी इस जिले में हैं और 91 व्यक्तियों का एक नया जत्था, जिनका अब तक कोई रेकॉर्ड नहीं है, वह भी इसी जिले में रह रहा है। चंपई के बाद सीमावर्ती जिले सियाहा में कुल 144 शरणार्थी रह रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 83 लोग हेंथिअल में, 55 लॉन्गतालाई में, 15 सेर्चिप में, 14 आइजोल में, तीन सैटुएल में और दो-दो नागरिक कोलासिब और लुंगलेई में रह रहे हैं।

म्यांमार से आ रहे इन शरणार्थियों को लेकर सरकार अब भी असमंजस में है। असल में केंद्र सरकार नहीं चाहती कि म्यांमार से कोई भी शरणार्थी यहां आ कर बसे। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं रोहिंग्या शरणार्थी। उनका मसला पहले से केंद्र सरकार के पास है और वह साफ कर चुकी है कि उन्हें किसी भी तरह की रियायत नहीं देना चाहती। मीडिया के एक हिस्से ने रोहिग्ंया शरणार्थियों का हौव्वा खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यही वजह है कि देश के अंदर रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर इस तरह का माहौल बन चुका है कि सरकार चाहे भी तो उन पर अपना स्टैंड बदलना उसके लिए मुश्किल होगा।

ऐसे में समस्या यह हो गई है कि यदि इन नए आगंतुकों का स्वागत किया जाता है तो सरकार के रवैये पर सवाल उठ जाएगा कि वह शरणार्थियों में धार्मिक आधार भेदभाव करती है। सरकार स्पष्टीकरण चाहे जो भी दे, दुनिया की एजेंसियां और तमाम देश निष्कर्ष अपने हिसाब से ही निकालेंगे। आसार यही हैं कि इससे दुनिया में भारत की किरकिरी होगी। इससे बचने का एकमात्र तरीका यह दिख रहा है कि नए आने वाले शरणार्थियों के साथ भी रूखा ही व्यवहार किया जाए। मगर सीमावर्ती क्षेत्रों की आम जनभावना इन शरणार्थियों के पक्ष में है। वहां लोग इनसे सहानुभूति रख रहे हैं। मिजोरम और मणिपुर में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें शरणार्थियों को सुरक्षित स्थान देने और पनाह देने का समर्थन किया गया है। यहां जानना जरूरी है कि मिजोरम की कई जनजातियों और सीमाई इलाके के बड़े चिन समुदाय में रोटी-बेटी के ताल्लुकात हैं।

भारत और म्यांमार के बीच कोई 1,643 किलोमीटर की सीमा है जिनमें मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड का बड़ा हिस्सा है। अकेले मिजोरम की सीमा 510 किलोमीटर लंबी है।

भारत की अर्थपूर्ण चुप्पी
ध्यान रहे म्यांमार की फौज ने पिछले साल 8 नवंबर को संपन्न हुए चुनावों में सू की की पार्टी की जीत को धोखाधड़ी करार देते हुए इसी साल एक फरवरी को वहां तख्ता पलट कर दिया। वहां के चुनाव आयोग ने चुनाव में धांधली के सेना के आरोपों को खारिज कर दिया था। बावजूद इसके, सेना ने आपातकाल लागू करके सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली। भारत ने इसे म्यांमार का अंदरूनी मामला बता कर लगभग चुप्पी साधी हुई है। लेकिन इसी बीच कई रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजने की कार्यवाही भी आगे बढ़ रही है। उस पार के सुरक्षा बलों की ओर से नए आए शरणार्थियों को भी सौंपने का दबाव डाला जा रहा है, जबकि स्थानीय लोग इसके विरोध में हैं। 18 मार्च को मिजोरम के मुख्यमंत्री जोर्नाथांगमा इस बारे में अपना विरोध भी एक खत के जरिये जता चुके हैं। यह समझा जाना चाहिए कि जनप्रतिरोध जिस स्तर पर पहुंच चुका है, उसे देखते हुए सैन्य अत्याचार को म्यांमार का आंतरिक मामला माने रहना आगे भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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