Thursday, August 5, 2021

सरकार में रहकर मैंने देखा, पीछे क्यों रह जाता है भारत

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लेखकः कौशिक बसु
इकॉनमिक पॉलिसी क्यों निहायत खराब बन जाती है, इसकी बहुत साफ वजह है। नेताओं की आम सहमति से नीतियां बनाई जाएंगी, तो उनके लचर होने का जोखिम बना रहेगा। इस तरीके से अगर हवाई जहाज बनाया जाए तो उसके डैने ऊपर की ओर उठे होंगे क्योंकि अधिकतर लोगों की नजर में वही ठीक होगा। उसकी नोज बाईं ओर मुड़ी होगी क्योंकि ज्यादातर लोग वही चाहते होंगे। ऐसे में तो वह विमान उड़ने से रहा।

फाइलों का चक्कर
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में एक दिक्कत है। हर फैसले में सभी लोग शामिल हो जाते हैं। कोई भी चीज मंजूर होने से पहले एक से दूसरे डेस्क पर सरकारी फाइलें घुमाई जाती हैं, नो ऑब्जेक्शन के सिग्नेचर के लिए। कहा जाता है कि लोकतंत्र में तो ऐसा होता ही है। कोई भी फैसला बहुमत की राय से होना चाहिए। इसे ‘वर्टिकल डेमोक्रेसी’ कहें तो ज्यादा ठीक होगा।

लेकिन लोकतंत्र का एक और रूप भी हो सकता है। इसमें सबकी राय तो होगी, लेकिन हर फैसले के बारे में नहीं। सभी निर्णयों को अलग-अलग कर दिया जाएगा। आप खुद से जुड़े हिस्से के बारे में ही राय दे सकेंगे। भारत को वर्टिकल के बजाय इसी तरह के लोकतंत्र को अपना लेना चाहिए। परमिशन लेने के वर्टिकल स्ट्रक्चर के कारण फैसले करने में देर होती है।

दरअसल सरकार में शामिल होकर अंदर से इसका कामकाज देखना दिलचस्प अनुभव रहा मेरे लिए। किसी भी अच्छी नीति के बीच राह में फंस जाने की बहुत साफ वजहें दिखती हैं। फैसले करने वाले नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स में एक तो कल्पनाशीलता नहीं दिखती और दूसरे वे बासी आइडिया की गलियों में चक्कर काटते रहते हैं।

भारत की अनाज खरीद नीति को ही ले लीजिए। कई दिक्कतें हैं इसमें। खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने के मसले पर कई बैठकों में मैं शामिल रहा। उनमें नौकरशाहों का जोर इस बात पर रहता था कि भारत सरकार को हर वक्त खाद्यान्न का एक तय भंडार बनाए रखना चाहिए। वे यह बात नहीं समझ पाते थे कि अगर एक तय मात्रा हमेशा रखी जाएगी तो हो सकता है कि वह भंडार की हैसियत खो बैठे।

कई ऐसे आइडिया होते हैं, जिनसे समस्याओं का जल्द निपटारा हो सकता है या कुछ फौरी राहत मिल सकती है, लेकिन लोगों को बनी-बनाई लीक छोड़ने के लिए राजी करना किसी जंग से कम नहीं होता। मुझे अफसोस है कि अपने आइडिया पर अमल के लिए मैं ज्यादा जोर नहीं लगा सका। मुझे लगता रहा कि इनमें से कुछ तो इतने अच्छे आइडिया हैं कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति सुनते ही इन पर अमल करना चाहेगा। तमाम बैठकों में मैंने जो बातें कहीं, उनमें से कुछ आइडिया पर उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ही नजर जाती दिखी।

दूसरे नेताओं के साथ प्रधानमंत्री को जब भी देखा, यही लगा कि वह इन सबसे अलग और बेहतर हैं। नेहरू की तरह भारत के लिए उनमें एक जुनून है। उनसे मेरी बातचीत में कभी भी राजनीति और रोजमर्रा की सियासी उठापठक का जिक्र नहीं हुआ। हमेशा यही बात हुई कि भारत को कैसे और अच्छा बनाया जा सकता है। मुझे पता है कि इसकी कोई खास वैल्यू शायद नहीं है। वोटर ही अगर यह बात समझ सकें तो देश कुछ और बेहतर हो सकता है।

सरकारी कामकाज में दिक्कतें पैदा होने की दो बड़ी वजहें हैं। टॉप ब्यूरोक्रेट्स पर काम का बहुत बोझ और हर बात के लिए मंजूरी लेने का चक्कर। एक तरफ तो यह बात काफी अच्छी लगती है कि सभी सीनियर सिविल सर्वेंट्स कड़ी मेहनत करते हैं। लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि वे अमूमन किसी मंत्री या सांसद के लिए बैक-एंड पर हर वक्त हुक्म बजा रहे होते हैं। ऊंचे सपने, काम के प्रति लगन या शोषण, चाहे जो वजह हो, ये सीनियर ब्यूरोक्रेट इस हद तक काम कर रहे होते हैं कि कुशलता, कल्पना और क्रिएटिविटी पर आंच आने लगती है। ये लोग शुरू में बहुत तेजतर्रार होते हैं, लेकिन बाद में तोते जैसे हो जाते हैं। ऐसे में सरकारी कामकाज में रचनात्मकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

दूसरी दिक्कत है हर मोड़ पर मंजूरी लेने की। ऐसी कई बेमतलब सी फाइलें नीचे से चलकर मंत्री तक ले जाई जाती हैं। आप देखिए कि कैसी-कैसी बातों के लिए मंजूरी मांगी जाती है। मसलन, बीमार रिश्तेदार से मिलने की खातिर एक दिन के लिए वाराणसी जाना है या मिनिस्ट्री में सर्व की जाने वाली कॉफी का ब्रैंड बदलना है या बाथरूम साफ रखने के लिए किसी और अटेंडेंट की जरूरत है। ऐसे सभी प्रस्ताव हार्ड कार्डबोर्ड के फोल्डर में एक से दूसरे कमरे में ले जाए जाते हैं, जिन पर ब्यूरोक्रेसी के सीनियर लोगों की राय लेनी होती है।

अमेरिका है अलग
इसके उलट अमेरिकी विश्वविद्यालयों का हाल देखिए। वहां सीनियर प्रफेसरों को बजट दे दिया जाता है। वे जरूरत के मुताबिक जब चाहें पैसे देकर नई दिल्ली, तोक्यो या इस्तांबुल से किसी को भी पढ़ाने-लिखाने के लिए बुला सकते हैं। वहां पहले से मंजूरी लेने के बजाय समय-समय पर समीक्षा करने का सिस्टम है। इसमें यह देखा जाता है कि कोई अपने अधिकार का दुरुपयोग तो नहीं कर रहा।

मुझे पता है, ऐसा सिस्टम अपनाने से शुरू में कुछ करप्शन और दुरुपयोग हो सकता है, लेकिन अभी जो हाल है, उसे देखते हुए बदलाव की कोशिश करनी चाहिए। फिर बात यह भी है कि कुछ मामलों में एक तरह की फाइनल अथॉरिटी होने से भरोसा पैदा होता है, जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है और ईमानदारी भी। शुरुआत में कुछ दुरुपयोग हो सकता है इस सिस्टम का, लेकिन यह भी तो देखें कि हर तरह के चेक एंड बैलेंस के बावजूद करप्शन खत्म तो नहीं हुआ है।

(पॉलिसीमेकर्स जर्नल, पब्लिशर- एसएंडएस इंडिया, लेखक अभी अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में इकॉनमिक्स और इंटरनैशनल स्टडीज के लिए कार्ल मार्क्स प्रफेसर हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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