Saturday, February 27, 2021

हार-जीत से आगे किसान आंदोलन के मुकाम और भी हैं

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बीती 26 जनवरी ऐसी तारीख है जो किसान आंदोलन को सीधे-सीधे दो हिस्सों में बांट देती है। इससे पहले तक यह आंदोलन जिस लय, ताल और तेवर के साथ चल रहा था, उस दिन की घटनाओं से एक झटके में वह सब बिगड़ता नजर आया। अराजक तत्वों की भीड़ और उसे मिले मीडिया कवरेज ने पूरे आंदोलन की जैसी छवि प्रस्तुत की, उससे सरकार की सारी आशंकाएं सच साबित होती लगने लगीं। राष्ट्रीय राजधानी में, खासकर लालकिले पर भीड़ का उत्पात देखकर लग ही नहीं रहा था कि यह उन्हीं किसानों का आंदोलन है जो अपनी चुनी हुई सरकार से उसके बनाए तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का आग्रह करते हुए भयानक ठंड में दो महीने से दिल्ली बॉर्डर पर बैठे थे। यह दृश्य पूरे देश के साथ-साथ खुद किसानों और उनके नेताओं ने भी देखा। सब हतप्रभ थे कि यह क्या हो गया। निराशा और नाकामी का गहरा भाव आंदोलन से जुड़े हर व्यक्ति के दिलोदिमाग पर हावी होता जा रहा था।

हरियाणा के हिसार में हुई एक किसान पंचायत (PTI)

आंदोलन का पुनर्जन्म
चाहे राकेश टिकैत का व्यक्तिगत करिश्मा कहिए या सरकारी तंत्र की ओर से आंदोलन खत्म कराने का जरूरत से ज्यादा उत्साह, या फिर भारतीय जनमानस में निहित संजीवनी शक्ति का प्रताप, पर मरता हुआ आंदोलन चार दिन के अंदर दोबारा जी उठा और पहले से कहीं ज्यादा बड़े दायरे में फैलता दिखने लगा। मगर मसला सिर्फ आंदोलन को मिलने वाले किसानों के समर्थन का नहीं था। 26 जनवरी की घटनाओं ने किसान नेतृत्व की साख पर जो बट्टा लगाया था, उससे आंदोलन का नैतिक प्रभाव कम हो गया था। व्यापक समाज में इस आंदोलन की स्वीकार्यता घट गई थी। इसे दोबारा हासिल करना आसान नहीं था।

किसान नेतृत्व भी इस बात को समझ रहा था। भले टिकैत बार-बार यह दोहराते रहे हों कि आंदोलन की कमान अब भी संयुक्त किसान मोर्चा के ही हाथों में है और जो भी फैसला होना है वहीं होगा, पर व्यावहारिक स्तर पर आंदोलन की मुख्य प्रेरक शक्ति के रूप में पंजाब की जगह यूपी ले चुका था। फिर भी यह काफी नहीं था। जरा सी भी गड़बड़ी आंदोलन को हमेशा के लिए पटरी से उतार कर समाप्त कर सकती था। स्वाभाविक रूप से किसान नेतृत्व इस मोर्चे पर अत्यधिक सावधान था। 6 फरवरी को चक्का जाम के कार्यक्रम से न केवल दिल्ली बल्कि यूपी और उत्तराखंड को भी बाहर रखा गया। बाद में स्पष्ट हुआ कि इन क्षेत्रों में उग्र और अराजक तत्वों के हाथ में आंदोलन चले जाने के अंदेशे को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया था। किसान नेतृत्व की दूसरी परीक्षा 18 फरवरी के रेल रोको कार्यक्रम के दौरान हुई। ऐसे कार्यक्रमों के दौरान रेल पटरियों गाड़ियों और स्टेशनों का कुछ न कुछ नुकसान होना आम बात मानी जाती रही है। मगर इस बार कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। यहां तक कि यात्रियों के प्रति विशेष सद्भाव दिखाते हुए आंदोलनकारी किसानों ने उनकी नाराजगी की आशंका भी दूर कर ली थी।

निश्चित रूप से इन सबसे किसान आंदोलन को पुरानी लय पाने में मदद मिली है। लेकिन 26 जनवरी के बाद के इस दूसरे दौर में सबसे ज्यादा मजबूती उसे जिस बात से मिली, वह है नैतिक चेतना से युक्त मध्यवर्गीय युवाओं का सक्रिय समर्थन। मगर यह समर्थन उसने अपने दम पर हासिल नहीं किया है। इसका लगभग पूरा श्रेय सरकार के अति-उत्साह को ही देना होगा। 26 जनवरी की घटनाओं के बाद भी जब आंदोलन समाप्त होता नहीं दिखा, बल्कि नए रूप में इसके और जड़ जमाने के आसार दिखाई देने लगे तब सरकार इसे खत्म कराने की ज्यादा सीधी कोशिशों में जुटी। इस क्रम में न केवल दिल्ली की सीमाओं पर बाड़ेबंदी तेज की गई और सड़कों पर गड्ढा खुदवाकर तथा कीलें गड़वा कर आंदोलनकारियों तक जरूरी समानों का पहुंचना कठिन बनाया जाने लगा बल्कि आंदोलन से जुड़ी सूचनाएं फैलने से रोकने के लिए इंटरनेट सेवाएं भी बाधित की जाने लगीं।

इन कोशिशों ने उन लोगों को भी आंदोलन के पक्ष में बोलने को प्रेरित किया जो कृषि क्षेत्र की बारीकियों से अनजान होने की वजह से किसान आंदोलन की मांगों पर कोई साफ राय नहीं बना पा रहे थे। लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उनकी संवेदनशीलता को नए सरकारी कदमों से जबर्दस्त ठेस पहुंची। इंटरनैशनल पॉप सिंगर रेहाना के ट्वीट ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय समर्थकों की नई बिरादरी से जोड़ा तो पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट के जरिए वह टूलकिट सामने आया जिससे ‘अंतरराष्ट्रीय साजिश’ की थियरी का पता चला। फिलहाल दिल्ली पुलिस अदालत में इस थियरी को सही साबित करने में जुटी है, इसलिए इस बारे में अभी से कुछ कहना उचित नहीं होगा, पर इस बहाने देश में यह बहस जरूर शुरू हो गई है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार छीनने की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं। इसे आंदोलन की एक ठोस कामयाबी माना जा सकता है- इसलिए भी कि किसानों की मांगों में ऐसा कुछ भी शामिल नहीं था।

असंगठित उत्पादकों का मंच
इस बीच किसान आंदोलन अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में भी निरंतर लगा हुआ है। राकेश टिकैत ने हाल ही में कहा कि जल्द ही पश्चिम बंगाल में भी किसान महापंचायत का आयोजन किया जा सकता है, और इसमें मछुआरों को भी आमंत्रित किया जा सकता है, जो अभी भारी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। आंदोलन के कई कार्यक्रमों को झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी अच्छा समर्थन हासिल हुआ है और वन संपदा पर निर्भर आदिवासियों को भी अगर इससे जोड़ा जा सके तो जल और जमीन से जीविका हासिल करने वाले समुदायों का एक देशव्यापी मंच इस दौर की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। देश में असंगठित और बिखरी दशा में रहने वाली उत्पादक शक्तियां अगर इसी बहाने एकजुट होती हैं तो यह लोकतंत्र ही नहीं अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण घटना होगी। ऐसा कोई मंच नियमित रूप से अपनी बात कहता रहे और सरकार को समय-समय पर अपनी मांगों तथा अपेक्षाओं से अवगत कराता रहे तो यह किसी आंदोलन की तात्कालिक सफलता-असफलता से कहीं आगे की चीज होगी जिसके लिए इसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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