Friday, May 7, 2021

Corona Warriors : हम ही पीछे हट जाएंगे तो लोगों का क्या होगा, जानें क्या बोले दिल्ली के ‘साइलेंट हीरो’

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हाइलाइट्स:

  • रोजे रखकर भी लगातार मरीजों की सेवा में जुटीं नर्सिंग ऑफिसर नाज शेख
  • डॉ. रेखा बोलीं- अस्पताल में ड्यूटी है इसलिए बात करते हुए भी कतराते हैं लोग
  • बताया कि ड्यूटी के चलते हो गईं पॉजिटिव, बुजुर्ग माता-पिता भी हैं पॉजिटिव

नई दिल्ली
”रमजान के पाक महीने में मैं रोजा रखने के साथ-साथ कोरोना मरीजों की सैंपलिंग, उनकी चेकिंग के अलावा अन्य काम भी कर रही हूं। रोजा रखकर पीपीई किट पहनना कई बार मुश्किल हो जाता है। फिर भी हम हिम्मत नहीं हार रहे हैं। मरीजों की हर संभव मदद कर रहे हैं। मरीजों को महामारी से लड़ने के उपाय बता रहे हैं। टीम में अगर कोई नया साथी आता है, तो हम उन्हें भी मदद करते हैं। इफ्तार के समय हम सभी स्टाफ एक साथ इफ्तार भी करते हैं।”

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यह बताते हुए नर्सिंग ऑफिसर नाज शेख कहती हैं कि इन सभी के साथ-साथ हम अपने बच्चों की सेफ्टी का भी पूरा खयाल रखते हैं। घर जाते ही सीधे बाथरूम में जाती हूं। पहले बैग को सैनेटाइज करती हूं। फिर नहाकर बच्चों के साथ समय बिताती हूं। उनके लिए खाना भी बनाती हूं। बच्चे भी मेरा खूब सहयोग करते हैं। नाज शेख इस समय रोहिणी के आंबेडकर अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर हैं।

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दो बच्चे हो गए थे पॉजिटिव
नाज ने बताया, पिछले साल अगस्त में मैं और मेरे दोनों बच्चे कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। पति मोहम्मद यूनुस सऊदी अरब में रहते हैं। ऐसे में खुद को और दोनों बच्चे अर्श (18) और फलक (15) को संभालना बड़ा मुश्किल हो गया था। लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों और अन्य साथियों का काफी सहयोग मिला। इसकी बदौलत हम इस जंग को जीतने में कामयाब रहे। ठीक होते ही 15 दिन बाद फिर से ड्यूटी जॉइन कर ली। दिसंबर महीने में आंबेडकर अस्पताल के फ्लू क्लिनिक में मेरी ड्यूटी लग गई। यहां कोरोना सैंपलिंग, सैंपल की पैकेजिंग से लेकर अन्य जिम्मेदारी निभाती रही। पहली बार कोरोना मरीजों के संपर्क में आने से डर भी लगता था, लेकिन धीरे-धीरे यह डर भी खत्म हो गया।

एक्स्ट्रा काम करना पड़ता है पीछे नहीं हटती
मार्च में फिर मेरी ड्यूटी फ्लू क्लिनिक में लग गई। मैंने बिना झिझक इस ड्यूटी को जॉइन किया। पिछले साल के मुकाबले इस साल कोरोना का न्यू वैरियंट काफी खतरनाक है, फिर भी मैं नहीं घबराई। अगर हम ही पीछे हट जाएंगे, तो आम लोगों का क्या होगा। आंबेडकर अस्पताल के कैंपस में ही रहती हूं। ऐसे में अस्पताल तक पहुंचने में काफी कम समय लगता है। रोजाना सुबह 8:50 बजे कमरे से निकल जाती हूं। 9 बजे अस्पताल पहुंच जाती हूं। सबसे पहले सैंपलिंग रूम को देखती हूं। जरूरी सामान है या नहीं, चेक करती हूं। स्टाफ को पीपीई किट, मास्क, कैप, शू कवर मिले या नहीं इसे भी देखती हूं। पीपीई किट किसी ने ठीक से पहना है या नहीं, सभी चीजों को चेक करती हूं। कई बार दो से तीन घंटे तक अतिरिक्त काम करना पड़ता है तो पीछे नहीं हटती हूं। अन्य स्टाफ को भी अकेला नहीं छोड़ती हूं। हर चार घंटे में पीपीई किट चेंज करने के लिए उन्हें कहती हूं।

सबसे बड़ी चुनौती माता-पिता को सेफ रखने की’
जब आप किसी प्राइवेट लैब, सरकारी अस्पताल या डिस्पेंसरी में कोविड टेस्ट करवाने जाते हैं तो क्या कभी सोचा है कि जो व्यक्ति आपका सैंपल ले रहा है, वह किस डर और खतरे में जी रहा है! उस वक्त उनके आसपास बड़ी संख्या में अलग-अलग लोगों के सैंपल पड़े रहते हैं। हर वक्त यही भय बना रहता है कि कहीं किसी सैंपल से वह पॉजिटिव ना हो जाएं। उनके साथ-साथ घर वालों पर भी बड़ा खतरा बना रहता है। कुछ इसी तरह के डर के माहौल में हर वक्त रहती हैं डॉ़ रेखा भंडारी। डॉ़ रेखा दिल्ली सरकार के अरूणा आसफ अली अस्पताल में कार्यरत हैं और इनकी ड्यूटी सैंपल लेने की है। लगातार 15 दिन तक सैंपल लेने की ड्यूटी करने के बाद अन्य 15 दिनों के लिए किसी अन्य डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ या लैब टैक्निशियन की ड्यूटी लगाई जाती है।

माता-पिता भी हो गए थे कोरोना पॉजिटिव
डॉ. रेखा भंडारी कहती हैं कि वह लंबे समय से यही ड्यूटी कर रही हैं और हाल ही में वह पॉजिटिव हो गई हैं। उनके पॉजिटिव होने के साथ ही उनके माता-पिता भी कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। वह बताती हैं कि ड्यूटी करते वक्त हमें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लोगों के सैंपल लेना, फिर उसे अच्छे से संभाल कर रखना, लैब तक पहुंचाना, चार से पांच घंटे तक पीपीई किट में रहना और इस दौरान ना तो पंखा चला सकते हैं, ना ही एसी। जब पीपीई किट उतारते हैं तो पूरी बॉडी पसीने से भरी मिलती है।

आस-पड़ोस के लोगों की सोच नहीं बदली
सबसे बड़ी समस्या शुरू होती है जब ड्यूटी के बाद घर जाती हूं। घर पर बुजुर्ग माता-पिता हैं। ऐसे में हर वक्त यही डर बना रहता है कि कहीं मेरी वजह से पैरंट्स को कोविड ना हो जाए। इसके अलावा आज भी आस-पड़ोस के लोगों की सोच बदली नहीं है। उन्हें लगता है कि चूंकि मैं डॉक्टर हूं, मरीजों के सैंपल लेती हूं तो मेरी वजह से उन्हें कोरोना हो सकता है इसलिए वह बात करने से भी कतराने लगे हैं। साथ ही इस वक्त जो हालात चल रहे हैं, उसे लेकर माता-पिता में भी मेरी ड्यूटी को लेकर डर बना रहता है। स्थिति यह है कि मैं ज्यादातर समय अपने माता-पिता से अलग एक कमरे में रहती हूं।

लोगों की मदद, सोच कर अच्छा लगता है
घर की एंट्रेंस भी अलग-अलग हैं ताकि माता-पिता को कोई खतरा ना हो लेकिन इतनी सावधानी बरतने के बाद भी वह हाल ही में कोविड पॉजिटिव हो गए हैं। मैं भी फिलहाल कोरोना पॉजिटिव हूं और होम आइसोलेशन में हूं। ऐसे में अब हम तीनों ही अलग-अलग कमरे में आइसोलेशन में हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ड्यूटी में काफी खतरा रहता है लेकिन यह सोचकर भी अच्छा लगता है कि इस मुश्किल वक्त में हम भी कुछ अच्छे काम में सहयोग कर रहे हैं।

nursing officer

नर्सिंग ऑफिसर नाज शेख (लेफ्ट) और डॉ. रेखा।



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