Sunday, April 11, 2021

Taslime Nasreen Controversy : आखिर तस्लीमा कुछ भी कहती हैं तो क्यों मच जाता है हंगामा?

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बांग्लादेशी की उदारवादी लेखिका तस्लीमा नसरीन की ब्रिटिश क्रिकेटर मोईन अली पर टिप्पणी को लेकर बवाल मचा हुआ है। उन पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। खासकर, इस्लामी-वामपंथी वर्ग आसमान सर पर उठा लिया है। लेकिन, ऐसा नहीं है कि तस्लीमा अपने बयान के लिए पहली बार निशाने पर आई हों। उनका इस तरह का ‘विवादित’ बयान देने का लंबा इतिहास रहा है। बल्कि यूं कहें कि वो ऐसे ही ‘विवादित’ बयानों के कारण ही चर्चा के केंद्र में रहा करती हैं, तो कुछ गलत नहीं होगा। तस्लीमा कट्टरपंथियों के निशाने पर तो रहती ही हैं, तथाकथित उदारवादी वामपंथी भी वक्त-वक्त पर उन्हें कोसते रहते हैं। आइए जानते हैं आखिर तस्लीमा के कब-कब मुंह खोलते ही हंगामा बरप गया…

​क्रिकेटर पर कॉमेंट करके घिरीं तस्लीमा

तसलीमा नसरीन ने मंगलवार को इंग्लैंड के एक क्रिकेट खिलाड़ी को लेकर जो कहा, उस पर जबर्दस्त बवाल मच गया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इंग्लैंड का यह ऑलराउंडर अगर क्रिकेट नहीं खेल रहा होता तो इसने आईएसआईस जॉइन कर लिया होता। इस पर इंग्लैंड के ही तेज गेंदबाज जोफ्रा आर्चर तस्लीमा की कड़ी निंदा की। हालांकि, हमले बढ़ते देख तस्लीमा ने यह ट्वीट हटा लिया और कहा कि वो तो मजाक कर रही थीं, लेकिन लोग हैं कि मजाक भी नहीं समझते। खैर, सच तो यह है कि इस तरह की टिप्पणी को मजाक में नहीं लिया जा सकता है। पढ़ें खबर

​तस्लीमा नसरीन और मुकदमों-फतवों का जंजाल

तस्लीमा नसरीन 1990 के दशक में दुनिया की नजरों में तब आईं जब उनके अपने देश बांग्लादेश में उनके खिलाफ ‘इस्लाम के अपमान’ का आरोप लगा। उन्होंने अपनी जीवनी में मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों और धार्मिक कट्टरता का जिक्र किया था जिससे गुस्साए मौलानाओं ने फतवे पर फतवे जारी कर दिए। उनकी किताबों पर अदालतों से बैन लगने लगे। उधर, मुसलमानों का कट्टरपंथी धड़ा उन्हें जान से मारने की फिराक में जुट गया। हालत ऐसी हुई कि उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा।

​लेखकों-साहित्यकारों की भी किरकिरी झेल चुकी हैं तस्लीमा

तस्लीमा को 1994 में एक तरफ से मुस्लिम धर्मगुरुओं तो दूसरी तरफ सरकार के निशाने पर भी आ गईं। उनके खिलाफ गर्दन काटने का फतवा जारी किया गया तो सरकार की तरफ से उनके खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट जारी हो गया। यह सब 1993 में उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ प्रकाशित होने के कारण हुआ। तस्लीमा ने भागकर पश्चिमी देशों में शरण लेना शुरू किया। वो अमेरिका की ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के कार सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स पॉलिसी में एक फेलो के रूप में जॉइन किया। लेकिन, उनकी बायोग्राफी सीरीज की तीसरी बुक ने लेखकों-साहित्यकारों की दुनिया में भी उधम मचा दिया। बंगाली भाषा के एक अक्षर ‘का’ शीर्षक से प्रकाशित एक पुस्तक में उन्होंने बांग्लादेशी राइटर सैयद शम्सुल हक की तरफ से जो दावा किया, उससे साहित्यिक जगत में उनकी कड़ी आलोचना हुई। बांग्लादेश ही नहीं, भारत के साहित्याकारों, लेखकों को टोली भी तस्लीमा के पीछे पड़ गई। तस्लीमा ने अपनी पुस्तक में दावा किया कि लेखक सैयद शम्सुल हक ने अपनी साली के साथ यौन संबंध की बात कबूली थी।

​तस्लीमा का इस्लाम पर ज्यादा फोकस

तस्लीमा नसरीन खासकर इस्लाम और इसके अनुयायियों पर कड़ी नजर रखती हैं। वो दुनिया से यहां तक अपील कर चुकी हैं कि इस्लाम का बहिष्कार किया जाए। उन्होंने 29 अक्टूबर, 2020 को ट्वीट कर लिखा, “बायकॉट इस्लाम”। इस ट्वीट पर कांग्रेसी-वामपंथी रुझान के एक ऐक्टिविस्ट साकेत गोखले ने उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया। गोखले ने इस ट्वीट को धार्मिक विद्वेष फैलाने वाला बताया। इससे कुछ दिन बाद तस्लीमा ने ट्वीट कर कहा, “इस्लाम धर्म में सुधार की जरूरत है, नहीं तो आधुनिक सभ्‍यता में इस धर्म के लिए कोई जगह नहीं है।” तस्लीमा कहती हैं कि इस्लाम शांति का धर्म है ही नहीं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि इस्लाम को शांति का धर्म कहना छोड़ दिया जाना चाहिए। इस्लाम और आतंकवाद को लेकर उनके कई बयान विवादों के कारण बने। यहां क्लिक कर देखें, उनके विवाद बयान।

वामपंथियों, उदारवादियों की भी आलोचना

तस्लीमा नसरीन तथाकथित वामपंथियों और उदारवादियों को इस्लामी दक्षिणपंथी के तौर पर देखती हैं। वो इस बात पर हैरत जताती हैं कि आखिर जो वामपंथी और उदारवादी अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीटते रहते हैं, वो इस्लाम का आलोचनात्मतक विश्लेषण बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसी तरह, वो महिलावादियों की भी यह कहकर खबर लेती हैं कि जो फेमिनिस्ट महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, वो आखिर महिलाओं के दोयम दर्जे का मानने वाले इस्लाम और इसके रीति-रिवाजों का समर्थन कैसे कर सकते हैं? मोईन अली पर टिप्पणी के बाद पैदा हुए विवाद के बाद वामपंथियों, उदारवादियों और फेमिनिस्टों की तरफ से आई कड़ी प्रतिक्रिया पर भी तस्लीमा ने काफी हैरानी का इजहार किया है। उन्होंने ट्वीट किया, “अगर आप इस्लाम को छोड़कर दूसरे धर्मों की आलोचना करते हैं तो आप प्रगतिशील, आजाद विचारक, उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, बौद्धिक, क्रांतिकारी कहलाते हैं। लेकिन जैसे ही इस्लाम को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने को कोशिश करते हैं, आप घृणित, डरावना, उबाऊ, धर्मांध और पैसे पर बिका हुआ इंसान हो जाते हैं।”

​भारत में तस्लीमा की जिंदगी

दुनियाभर का चक्कर काटकर तस्लीमा ने भारत को ही आखिरी ठिकाना बना लिया है। वो भारतीय नागरिकता पाने की लगातार जद्दोजहद कर रही हैं। उन्हें भारतीय नागरिकता तो नहीं मिल पाई है, लेकिन स्वीडन की नागरिकता प्राप्त करने में उन्हें सफलता जरूर मिल गई है। हालांकि, वो ज्यादातर वक्त भारत में ही बिताती हैं। 1990 के दशक में ही बांग्लादेश छोड़कर दर-दर भटकने वाली तस्लीमा नसरीन को भारतीय नागरिकता देने की हिम्मत यहां कोई भी सरकार नहीं जुटा पाई है। सरकारों को डर है कि तस्लीमा को स्वीकार करते ही करोड़ों मुसलमान और तथाकथित उदारवादी वर्ग अपने सर पर आसमान उठा लेंगे। देश में सामाजिक उथल-पुथल नहीं मचे, इस डर से सरकारें उनकी वीजा अवधि तो बढ़ा देती हैं, लेकिन पूर्ण नागरिकता देने से कतराती रही हैं।

​…जब तस्लीमा पर जवाब दे गई मोदी सरकार की भी हिम्मत

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पहली बार सरकार बनी तो कुछ महीने बाद ही तस्लीमा नसरीन ने भारत की नागरिकता के लिए फिर से आवेदन कर दिया। भारतीय मुसलमानों इस बात को लेकर सशंकित थे कि कहीं मोदी सरकार तस्लीमा को भारत की नागरिकता न दे दे। ईद का माहौल था। इस मौके पर कोलकाता के रेड रोड में आयोजित समारोह में मौलाना कारी फजलुर रहमान ने मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी। लेकिन, जब कुछ दिनों बाद मोदी सरकार ने तस्लीमा का टेंपररी टूरिस्ट वीजा की अवधि तो दो महीने के लिए बढ़ा दी, लेकिन उन्हेंभारतीय नागरिकता देने से इनकार कर दिया तो यही मौलाना कारी फजलुर रहमान खुशी से उछल पड़े। उन्होंने मोदी सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह ऐलान तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था।

​भरी संसद में प्रणब दा ने कहा था- तसलीमा को देते रहेंगे शरण

बात नवंबर 2007 की है। बीजेपी तब विपक्ष में थी। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार में प. बंगाल से आने वाले कद्दावर नेता प्रणब मुखर्जी ने बीजेपी के सवाल पर लोकसभा में ऐलान किया कि उनकी सरकार तसलीमा नसरीन को भारत में आश्रय देती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि तस्लीमा को केंद्र और राज्य सरकारों का संरक्षण भी मिलता रहेगा। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तब कहा था, “भारत ने अपने पूरे इतिहास में ऐसे किसी शख्स को कभी आश्रय देने से इनकार नहीं किया है जो यहां आए और सुरक्षा चाही है।” उन्होंने कहा कि यह सभ्यता मूलक विरासत अब सरकार की नीति है जो आगे भी जारी रहेगी। दरअसल, विपक्ष में बैठी बीजेपी ने सरकार से सवाल किया था कि बांग्लादेशी लेखिका को पश्चिम बंगाल से क्यों निकाला गया? उन्हें अब कहां रखा जाएगा? सरकार उनकी सुरक्षा की क्या व्यवस्था करेगी और तसलीमा की इच्छा के अनुसार फिर उन्हें पश्चिम बंगाल में रहने की इजाजत मिलेगी या नहीं?



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