Monday, June 21, 2021

‘TMC से आए लोगों पर भरोसा करते लेकिन अपनों पर बिल्कुल भरोसा न करना सही नहीं’

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विधानसभा चुनाव हारने के बाद पश्चिम बंगाल बीजेपी के अंदर शुरू हुई उठापटक खत्म होने का नाम नहीं ले रही। पार्टी के अंदर नए-पुराने का झगड़ा तो अपनी जड़ मजबूत कर ही रहा है, कई बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। त्रिपुरा के राज्यपाल और बीजेपी पश्चिम बंगाल अध्यक्ष जैसे पदों पर रह चुके तथागत रॉय ने मंगलवार को दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद तथागत रॉय ने पार्टी के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष, प्रभारी सहित चार नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि वे नेता चुनाव की जिम्मेदारी संभालने में अक्षम थे। इसके बाद सीनियर लीडरशिप ने रॉय से दिल्ली आने को कहा। तथागत रॉय से एनबीटी नैशनल ब्यूरो की विशेष संवाददाता पूनम पाण्डे ने बात की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

आपके बयान के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने आपको दिल्ली बुलाया था, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात कैसी रही?
मैंने उन्हें सारी बातें बताईं। जो-जो मसले मैंने उठाए थे, सब पर चर्चा हुई। मुझे यह भरोसा मिला कि वह उन मसलों पर विचार-विमर्श करेंगे। मैं इससे संतुष्ट हूं। मैं दिल्ली में शुभेंदु अधिकारी से भी मिला और आगे भी मिलूंगा।

चुनाव नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल बीजेपी में इतनी उथल पुथल क्यों है?
चुनाव नतीजों में ममता जी की रणनीति के साथ ही हमारी गलतियों की भी भूमिका रही। उससे नतीजों के बाद उथल-पुथल स्वाभाविक है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर जीते थे। उस हिसाब से 126 विधानसभा सीटें मिलनी चाहिए थीं, पर सिर्फ 77 मिलीं।

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जो उथल पुथल चल रही है, उससे क्या संगठन कमजोर नहीं होगा?
संगठन कमजोर होने की वजह से ही हमें चुनाव में कम सीटें मिलीं। अब संगठन को नई दिशा देनी है, वही मंथन चल रहा है। इस बारे में केंद्रीय नेतृत्व फैसला लेगा।

चुनाव के वक्त बीजेपी में बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस के लोग आए। क्या इस तरह सभी के लिए पार्टी के दरवाजे खोल देना सही कदम था?
लगता तो नहीं है, क्योंकि 140 के आसपास लोग तृणमूल से आए थे। उनमें से 5-6 ही जीते। उनकी जीत के स्ट्राइक रेट के नजरिए से देखा जाए तो वह फैसला सही नहीं था।

तृणमूल से आए लोगों पर भरोसा करने के बजाय पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करते, तो क्या नतीजे अलग होते?
ऐसा नहीं है कि तृणमूल से आए लोगों पर बिल्कुल भरोसा नहीं करना चाहिए था, पर पार्टी के पुराने लोगों पर भरोसा ना करना सही नहीं था। मैं भी पार्टी का पुराना आदमी हूं। पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और समर्पित स्वयंसेवकों को नजरअंदाज करके सिर्फ तृणमूल से आए लोगों पर निर्भर रहना उचित नहीं था। यह तो नतीजों से साबित होता है।

आप पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, तो क्या चुनाव के वक्त आपकी राय ली गई रणनीति बनाने में?
बिल्कुल भी नहीं ली।

पार्टी के किसी पुराने चेहरे के बजाय शुभेंदु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। क्या इसका बीजेपी को फायदा होगा?

शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया। यह कोई छोटी बात नहीं है। सिटिंग चीफ मिनिस्टर को हराना बहुत बड़ी बात है। शुभेंदु अधिकारी बड़े नेता हैं। उन्हें जो जगह दी गई, वह बिल्कुल सही है। शुभेंदु अधिकारी जैसा नेता पार्टी में कोई दूसरा नहीं है। उन्हें दायित्व सौंपने से पार्टी को फायदा ही होगा।

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मुकुल रॉय सहित कई लोगों की तृणमूल में वापस जाने की चर्चा चल रही है। क्या वजह लगती है?
जो लोग आए थे और वापस चले गए, उनका कोई बीजेपी से लगाव नहीं था। वे अपने फायदे के लिए आए थे। जब देखा कि हार गए तो वापस चले गए। बीजेपी में आकर चुनाव लड़ने का फायदा लिया, फिर भाग गए। मुकुल रॉय वापस जाएंगे ऐसा किसी ने नहीं कहा, इसलिए उन पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। जो लोग वापस जा चुके हैं, उनके बारे में कह सकता हूं कि जैसे हमारा शरीर मल-मूत्र त्यागने से दुर्बल नहीं, बल्कि सबल होता है, वैसे ही बीजेपी भी सबल होगी, दुर्बल नहीं होगी।

क्या ममता बनर्जी के खिलाफ जरूरत से ज्यादा आक्रामकता की वजह से बीजेपी को नुकसान हुआ है?
यह कहना मुश्किल है। भाषा में थोड़ा संयम होना चाहिए था, इस बारे में मैं सहमत हूं पर आक्रामक तो होना ही चाहिए था।

बीजेपी का पश्चिम बंगाल फतह करना सपना है क्योंकि यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कर्मभूमि भी रही है। इस बार के चुनावी नतीजे बीजेपी के लिए कितना बड़ा झटका है?
ऐसा कोई बड़ा झटका नहीं है। बीजेपी में इतना लचीलापन जरूर है कि एक बार हम घट गए तो हम फिर काम करके बढ़ते हैं। 1984 में हमें लोकसभा में सिर्फ दो सीट मिली थी। हम वहां से फिर उठकर खड़े हुए और फिर लगातार आगे बढ़ते रहे। इस हालात से भी हम लोग उठकर खड़े हो जाएंगे। लेकिन यह जरूर है कि पार्टी को संगठन कैसा हो, रणनीति कैसी हो, इस सब पर फैसला लेना चाहिए। मैं पहले ही संगठन को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में बोल चुका हूं और पार्टी को भी इससे अवगत करा चुका हूं।



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