Saturday, April 17, 2021

West Bengal Election : गोलवलकर कनेक्शन, राम मंदिर, आबादी का बदला चरित्र और ममता की ‘मदद’, बंगाल में संघ का सफर

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तो क्या ममता ये भांप नहीं पाई कि संघ पिछले 10 वर्षों से पश्चिम बंगाल में वही काम कर रहा था जिसका डर अब उन्हें सता रहा है। आठ जून, 2014 को दक्षिण चौबीस परगना के बरुईपुर में आरएसएस ने एक विरोध रैली निकाली। ये टीएमसी की कथित गुंडागर्दी के खिलाफ थी। पश्चिम बंगाल में 13 साल बाद संघ इस तरह का आयोजन कर रहा था। इससे पहले 2001 में रैली हुई थी जब सोनाखाली में संघ के चार स्वयंसेवकों की हत्या कर दी गई। कम्युनिस्ट सरकार को हटा ममता के सत्ता पर काबिज होने के बाद से ही संघ लगातार विस्तार कर रहा था। बरुईपुर इसी का एक पड़ाव था। यहां दक्षिण बंगाल के प्रांत संघचालक अतुल कुमार बिस्वास भी थे। उन्होंने मंच संभाला और धर्मयुद्ध का ऐलान कर दिया। 2013 से 2014 के बीच ही बंगाल में शाखाओं की संख्या 850 से बढ़कर 1300 हो गया था। ये सिलसिला 2016 में ममता की दोबारा जीत के बाद लगातार जारी रहा। अब नज़र डालते हैं पश्चिम बंगाल में संघ के सफर पर..

​हेडगेवार-गोलवलकर का बंगाल कनेक्शन

1925 में संघ की स्थापना के दशकों बाद तक पश्चिम बंगाल में इसकी मौजूदगी न के बराबर थी। हालांकि केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर का खास कनेक्शन बंगाल से रहा। हेडगेवार कोलकाता में पढ़े और महाराष्ट्र जाने के बाद भी इस शहर से नाता-रिश्ता बना रहा। 1940 में संघ की बागडोर लेने से चार साल पहले एमएस गोलवलकर बंगाल आए और मुर्शिदाबाद में स्वामी अखंडानंद के आश्रम में रम गए। लेकिन 1937 में अपने गुरु के निधन के बाद वह नागपुर लौटे। संघ में फिर सक्रिय हो गए। 1940 के बाद तो तीन दशकों तक संघ को तराशने का काम उन्होंने ही किया। उन्होंने ही कोलकाता के मनिकतला स्कूल के हेडमास्टर से कहा और पहली शाखा इसी स्कूल के बच्चों ने उत्तरी बंगाल के टेलकोल मठ में लगाई। 1944 तक बहरामपुर, बर्धमान, उत्तरपारा और मिदनापुर में संघ की शाखाएं चलने लगीं।

भारत-पाकिस्तान जंग और राम मंदिर आंदोलन

पश्चिम बंगाल में संघ का विस्तार 1965 के भारत -पाकिस्तान युद्ध के ठीक बाद तेजी से हुआ। हालांकि 70 के दशक में कांग्रेस के कथित कुशासन के खिलाफ वामपंथी विचारधारा के प्रसार ने इस पर ब्रेक लगा दिया। दोनों एक – दूसरे के वैचारिक दुश्मन तो थे ही इस बिना पर कार्यकर्ताओं के बीच खून खराबे की नौबत आ जाती थी। राम मंदिर आंदोलन के समय हिंदुत्व के प्रखर प्रसार ने फिर संघ को फैलने का मौका दिया। सिर्फ 1991 में पश्चिम बंगाल में 100 प्रचारक थे। इससे उत्साहित होकर संघ ने अगले ही साल 1992 में नादिया जिले के कल्याण में तीन दिनों का कैंप लगाया जिसमें 17 हजार से ज्यादा स्वयंसेवक शामिल हुए। ये पश्चिम बंगाल में संघ का सबसे बड़ा आयोजनथा। इस दौरान शाखाओं की संखया भी बढ़कर 1500 हो गई। सन 2000 तक संघ की गतिविधियां पूरे राज्य में चलती रही। तभी अचानक पहले ज्योति बसु और फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य सरकार ने संघ के खिलाफ सख्ती दिखाई।

​टीएमसी-बीजेपी और लेफ्ट के बीच तकरार

1998 में जब कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाया उस समय तक देश में पहली गैर कांग्रेसी बीजेपी सरकार बन चुकी थी। भले ही ये 13 दिनों तक ही चल पाई। 1998 ऐसा साल था जब अटल बिहारी वाजपेयी दोबारा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले थे। ममता बनर्जी को लगा कि अगर बीजेपी का साथ मिल जाए तो पश्चिम बंगाल में वामपंथी एकाधिकार को खत्म करने में मदद मिलेगी। दोनों पार्टियों में गठजोड़ हुआ। 1998 से 2000 के बीच मिदनापुर, बांकुरा और हुगली जिलों में टीएमसी-बीजेपी और वामदलों के कार्यकर्ताओं के बीच कई बार झड़पें हुई। लेफ्ट किसी कीमत पर अपना नए दुश्मन के लिए जमीन खाली नहीं करना चाहता था। राज्य में उनकी सरकार थी, इसलिए पुलिस भी उसी मुताबिक काम कर रही थी। 2003 तक संघ की शाखाएं घटकर 1000 पर आ गई और 2011 तक ये 800 तक सिमट गई।

​टीएमसी के खिलाफ संघ का उभार

2008 के पंचायत चुनाव से पहले बीजेपी और तृणमूल के रास्ते अलग हो गए। संघ की अगली रणनीति साफ थी। वामदल अब पूरी ताकत ममता को रोकने पर लगा रहे थे। संघ को आभास हो गया था कि अब राज्य से वाम की विदाई तय है। ऐसे में राह का रोड़ा ममता ही बनने वाली थी। जब आप भविष्य के दुश्मन को समय से पहले चिन्हित कर लें तो लड़ाई आसान हो ही जाती है। इसलिए ममता के राइटर्स बिल्डिंग पहुंचने के पहले ही संघ ने उनको निशाने पर लिया। पंचायत चुनाव , फिर कलकत्ता नगर निगम के चुनाव में ममता ने मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की। 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने बताया कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की हालत गुजरात से भी खराब है। इसके बाद मुसलमानों को ममता में अगला ठिकाना दिखाई देने लगा। संघ के लिए ये रामबाण की तरह था। संघ ने ममता पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगाए। लगातार 10 वर्षों तक ममता के हर फैसले को संघ ने तुष्टीकरण की कसौटी पर कसा। इसी का नतीजा है कि 2021 के चुनाव में बीजेपी कड़ी टक्कर दे रही है।

​मुसलमानों की आबादी का बदलता चरित्र

साल 2009 में संघ से जुड़े मोहित रे ने 10 हजार पन्नों के रिसर्च में बताया कि पश्चिम बंगाल में कैसे मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने लिखा – हाल के दिनों में जो परिसीमन हुआ उसके खतरनाक नतीजे सामने हैं। हिंदू बहुल क्षेत्रों की संख्या घट गई है, वहीं मुस्लिम बहुत विधानसभा क्षेत्र बढ़ गए हैं। कोलकाता में सीटों की संख्या 21 से घटाकर 11 कर दी गई। वहीं मुसलमान बहुल मुर्शिदाबाद में तीन सीटें बढ़ाई गई। यही उत्तरी दिनाजपुर और नादिया जिले में हुआ है। अब जरा 2001 की जनगणना पर गौर फरमाइए। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 25.25 प्रतिशत है जबकि 0-6 साल के बच्चों में उनका हिस्सा 33.17 प्रतिशत है।

संघ और इससे जुड़े संगठनों से पूरे राज्य में आबादी के बदलते चरित्र को उजागर किया। 2011 में वामपंथ की विदाई के बाद विवेकानंद युवा शिविर के नाम से संघ ने 10 हजार स्वयंसेवकों को इकट्ठा किया। राज्य में 23 साल बाद इस तरह का आयोजन हो रहा था। सुरेश जोशी और मोहन भागवत भी इसमें शामिल हुए। वामपंथ की वैचारिक बाधा ध्वस्त होने के बाद संघ अब रुकने के मूड में नहीं था। 2014 तक शाखाओं की संख्या फिर से बढ़ कर 1000 के पार हो गई।

अब संघ ने संगठन की ताकत को बीजेपी में ट्रांसफर करने की रणनीति पर काम शुरू किया। प्रचारक से सीएम के संभावित उम्मीदवार बने दिलीप घोष इसी प्रयोग का परिणाम है। इसकी चर्चा अगले लेख में करेंगे।



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