Wednesday, January 27, 2021

कैलाश के द्वारपाल और भगवान शिव के प्रमुख गणों में से एक नंदी का ऐसे हुआ जन्म

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शिव के परिवार के एक सदस्य हैं नंदी, लेकिन वह मंदिर से बाहर या शिव से कुछ दूरी पर बैठते हैं, जानें कारण…

वे नंदी ही हैं जो भगवान शिव यानि भोलेनाथ को सभी लोकों की यात्रा कराते हैं। हिन्दू धर्म में, नन्दी कैलाश के द्वारपाल हैं, जो शिव का निवास है। वे शिव के वाहन भी हैं जिन्हे बैल के रूप में शिवमंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाता है। संस्कृत में ‘नन्दि’ का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है।

शैव परम्परा में नन्दि को नन्दिनाथ सम्प्रदाय का मुख्य गुरु माना जाता है, जिनके 8 शिष्य हैं- सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार, तिरुमूलर, व्याघ्रपाद, पतंजलि, और शिवयोग मुनि। आमतौर पर शिव के साथ उनके परिवार की प्रतिमाएं होती हैं। यूं तो नंदी भी भगवान शिव के परिवार के एक सदस्य हैं, लेकिन इसके बावजूद वह मंदिर से बाहर या शिव से कुछ दूरी पर बैठे रहते हैं। क्या आप जानते हैं इसका कारण क्या है?

शिव का वरदान
भगवान शिव के 19 अवतारों में से नंदी अवतार की कथा भी है, नंदी को भगवान शिव के गणों में प्रमुख माना जाता है। कथा के अनुसार शिलाद मुनि से जुड़ी है जो बहुत बड़े तपस्वी और ब्रह्मचारी थे। उनके पितृ देवों को आशंका हुई कि संभवतः उनका वंश आगे नहीं बढ़ेगा, क्योंकि शिलाद मुनि गृहस्थ आश्रम नहीं अपनाना चाहते थे।

मुनि ने इंद्र देव की तपस्या की और उनसे वरदान में ऐसा पुत्र मांगा जो जन्म और मृत्यु से हीन हो। इंद्र ने ऐसा वरदान देने से असमर्थता जताई और बोले, ऐसा वरदान देना मेरी शक्ति से बाहर है। आप भगवान शिव को प्रसन्न कीजिए, अगर शिव चाहें तो कुछ भी असंभव नहीं।

इसके बाद शिलाद मुनि ने शिव की तपस्या की। शिव प्रसन्न हुए और स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। वरदान के फलस्वरूप नंदी का प्राकट्य हुआ। भगवान शिव ने ही नंदी को वरदान दिया था, कि जहां नंदी का वास होगा वहां स्वयं महादेव निवास करेंगे।

ऐसे बने नंदी शिव के गण…
शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को संपूर्ण वेदों का ज्ञान प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य ऋषि पधारे। नंदी ने अपने पिता की आज्ञा से उन ऋषियों की उन्होंने अच्छे से सेवा की। जब ऋषि जाने लगे तो उन्होंने शिलाद ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं।

तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया? इस पर ऋषियों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने जानकर पूछा क्या बात है पिताजी। तब पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में ऋषि कह गए हैं इसीलिए मैं चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं।

इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं उम्रभर आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं। नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया। शिव के वरदान से नंदी भी जन्म-मृत्यु से परे हैं।

नंदी के खास गुण
नंदी के दर्शन से मन को प्रसन्नता प्राप्त होगी है। नंदी के नेत्र, चरण, गले की घंटी बहुत सुंदर हैं। नंदी के नेत्र सदैव भगवान शिव की ओर देखते रहते हैं। वह सदा अपने प्रभु का स्मरण करता है। शिव के मंदिर जाएं तो नंदी के दर्शन जरूर करें और दर्शन-प्रणाम के बाद उसके सींगों को स्पर्श कर अपने मस्तक से लगाएं।

नंदी के सींग ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं। इससे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। नंदी के गले की घंटी भगवान की धुन में रमे रहने की प्रतीक है। नंदी को प्रणाम के दौरान अपनी मनोकामना उसके कान में जरूर कहें। ऐसा करने से वह बहुत शीघ्र भगवान शिव तक पहुंचती है और नंदी की बात शिव सदा स्वीकार करते हैं।















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