Sunday, April 11, 2021

अगर प्रेग्नेंट महिलाओं को हो जाए ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, तो करें यह काम

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मौजूदा समय में स्लीप एपनिया जैसी समस्या का शिकार हर कोई है। जिसकी वजह से और भी गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ जाता। अगर यह बीमारी गर्भवती महिलाओं को हो जाए तो और भी गंभीर बात है। आज इस आर्टिकल में इसी समस्या और इसके हल के बारे में आपको बताया जा रहा है।

नई दिल्ली। ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया यानी नींद में लगातार रुकावट, दिन के दौरान लगातार सुस्ती का अनुभव, एकाग्रता की कमी, सजगता में कमी, जैसी समस्याएं पुरुषों की तरह महिलाओं को भी समान रूप से प्रभावित करती हैं। महिलाओं में यह समस्या डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, सिरदर्द, चिंता आदि के रूप में भी मौजूद हो सकती है। रोजमर्रा के घरेलू कामों के संदर्भ में इन समस्याओं के परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि महिलाओं को हर दिन संभावित रूप से जोखिम भरे उपकरणों का प्रयोग करना पड़ता है। महिलाओं को हर दिन गैस स्टोव पर खाना पकाने से लेकर बिजली से चलने वाले वॉशिंग मशीन, इलेक्ट्रिक टोस्टर, ओवन इत्यादि का इस्तेमाल करना पड़ता है। साथ ही गाड़ी चलाने वाली और अपनी नौकरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कामकाजी महिलाओं के लिए जीवन और भी जिम्मेदारियों से भरा होता है।

महिलाओं मे ओएसए की संभावना 2 से 3 फीसदी
जयपुर स्थित नारायण मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल हेड और कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. शिवानी स्वामी का कहना है कि पूरी दुनिया में महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की संभावना लगभग तीन गुना ज्यादा होती है और मेनोपॉज वाली महिलाओं में इसकी संभावना पुरुषों के समान ही होती है। ये आंकड़े पूरे विश्व के साथ-साथ भारत के लिए भी एकदम सही हैं। इस गणना के आधार पर हम अनुमान लगा सकते हैं कि, भारत की महिला आबादी में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की संभावना 2-5 फीसदी तक हो सकती है, साथ ही मेनोपॉज वाली महिलाओं के लिए यह बढ़ सकती है।

क्या कहती है स्टडी?
डॉ. शिवानी स्वामी ने बताया कि सितंबर 2016 में बायोमेड रिसर्च इंटरनेशनल में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, महिलाओं में अपेक्षाकृत ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया कम होने की संभावना आंशिक रूप से लैंगिक आधार पर ऊपरी श्वास-नली की संरचना, शरीर में वसा की मौजूदगी तथा सांसों की स्थिरता में अंतर के कारण हो सकती है। अन्य अध्ययनों में, एमआरआई जांच से यह बात सामने आई है कि महिलाओं की जीभ का आकर बड़ा और तालु का आकार छोटा होता है, साथ ही पुरुषों की तुलना में महिलाओं के गले में सॉफ्ट टिश्यू की संख्या भी कम होती है। इस प्रकार, महिलाओं में सोते समय जीभ से सांस लेने में बाधा उत्पन्न होने की संभावना स्पष्ट तौर पर काफी कम है।

इन बीमारियों का हो सकती हैं शिकार
डॉ. शिवानी स्वामी के अनुसार आजकल पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी मोटापे की समस्या से जूझ रही हैं। ऐसी परिस्थिति काफी गंभीर है, क्योंकि शरीर का वजन ज्यादा बढऩा ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया और इसकी वजह से होने वाली समस्याओं का सबसे बड़ा संकेत है। इस प्रकार, गर्दन और कमर की मोटाई ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की समस्या से पीडि़त होने की ओर इशारा करता है। महिलाएं मोटापे की वजह से कई अन्य समस्याओं से भी प्रभावित हो सकती हैं – जैसे कि गर्भधारण करने में कठिनाई, गर्भावस्था के दौरान गंभीर परिस्थिति उत्पन्न होने का जोखिम और विभिन्न प्रकार के हार्मोनल असंतुलन। ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की वजह से होने वाले मोटापे को इनमें से ज्यादातर समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के बीच संबंधों को उजागर किया गया है; इसे भी ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के कारण होने वाले हार्मोनल असंतुलन तथा मोटापे की श्रेणी में रखा जा सकता है।

हार्ट अटैक और पैरालाइटिक स्ट्रोक की संभावना
डॉ. शिवानी स्वामी बताती है कि ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की वजह से टाइप-ढ्ढढ्ढ डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों की गंभीरता बढ़ जाती है, साथ ही हार्ट अटैक या दिल की धड़कनों में असामान्यता के कारण पैरालाइटिक स्ट्रोक (जिसे सेरिब्रो-वस्क्यूलर एक्सीडेंट भी कहा जाता है) की संभावनाओं में भी वृद्धि होती है। कम उम्र की महिलाओं की तुलना में पुरुषों में इस प्रकार समस्याएं सामान्य तौर पर अधिक नजर आती हैं। हालांकि, 50 साल की आयु वाले पुरुषों और महिलाओं में इन नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज की संभावनाएं लगभग एक जैसी होती हैं। बुजुर्ग आयु वर्ग के पुरुषों एवं महिलाओं में इन बीमारियों की संभावना में लगभग कोई अंतर नहीं है।

पता चलने पर करें यह काम
इसलिए अगर महिलाओं को पता चलता है कि उन्हें ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया है, तो उन्हें क्या करना चाहिए? सबसे पहले उन्हें नींद से जुड़ी इस बीमारी की गंभीरता का पता लगाने के लिए स्लीप टेस्ट करवाना चाहिए। स्लीप लेबोरेटरी के अलावा घर में स्लीप टेस्ट के जरिए भी यह जांच की जा सकती है। इससे नींद की अवधि और गुणवत्ता, दोनों का सही आकलन करने में मदद मिलती है, जिसमें रैपिड आई मूवमेंट की अवधि सहित नींद और गहरी नींद का विश्लेषण शामिल है। यह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि रैपिड आई मूवमेंट स्लीप के दौरान चेतन मन में विचारों और अनुभवों का संकलन होता है।

इस थेरेपी कर सकते हैं प्रयोग
डॉ. शिवानी स्वामी की मानें तो पैरालाइटिक स्ट्रोक के इलाज के लिए सामान्य तौर पर पॉजिटिव एयर प्रेशर थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें हवा को थोड़े दबाव के साथ साँस नली के जरिए भेजा जाता है। इस तरह सोते समय मरीजों की श्वास नली खुली रहती है, और वे इस दौरान बिना किसी रुकावट के आराम से साँस ले पाते हैं। इस तरह उनकी नींद के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।













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